रविवार, 21 सितंबर 2014

ह्रदय या मुट्ठी भर अँधेरा ?













जितनी कसी होगी मुट्ठी
उतना अधिक रिसता जाएगा 
प्रेम,
स्वप्न,
जीवन.

बंद मुट्ठी में सहेजी जा सकती है 
केवल रूढ़ियाँ, 
भ्रांतियाँ, 
और अँधेरा. 

मुट्ठियों का खुलना ज़रूरी है.

खुली हथेलियों पर ही पढ़ी जा सकती हैं 
जीवन की आढ़ी-तिरछी रेखाएँ, 
मुट्ठी खोलकर की थामा जा सकता है हाथ, 
किया जा सकता है प्रेम,
लिखी जा सकती है चिट्ठियाँ,
पलटा जा सकता है इतिहास का
कोई अपठनीय पृष्ठ.

चलो 
खोल दे सदियों से तनी-कसी मुट्ठियाँ 
जिनसे झड़ती रेत के साथ 
गिरकर टूट जाए मिट्टी के भ्रम भी,
मुक्ति पा जाए रूढियों के प्रेत, 
तिरोहित हो जाए मुट्ठी भर अँधेरा.


शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

सुनो




शब्दों में लिखा सबकुछ कई दरम्यान एक पर्दा होता है... या कई-कई परदे. एक दुसरे को ढापे-ढके हुए. पहेली के हिस्सों की मानिंद. कहानियों के उलझे हुए हिस्सों के जैसे. और तब लिखा हुआ अर्थ और उसकी  समझ की सीमा के बाहर परवाज़ खोजता है..

तुम्हे बुलाता है... लेकिन भीड़ के साथ नही.

अरे सुनो, भीड़ चाहिए होती  तो यूँ शहर में अकेला क्यों रहता.
कहो.

मेरा सारा लिखा एक आमंत्रण है. तुम्हे. इस पहेली को सुलझाने का नही... ये कोई परीक्षा नही है... इस पहेली के भीतर आने के लिए. केवल तुम्हे.

मै नही चाहता लिखा हुआ समझ लिया जाए. मेरा लिखा.

लिखते हुए मै सीक्रेट एजेंट की तरह हो जाता हूँ. चाहता हूँ कि असल अर्थ बस तुम तक पहुंचे. बाकी सब उलझ जाए. धोखा खा जाए. ये अब एक खेल जैसा हो गया है. ये सुख भी है. और यंत्रणा भी. बोथ सैडिस्ट एंड  मेसोचिस्ट.


गुरुवार, 18 सितंबर 2014

स्मृति-पुराण







जीवन-मृत्यु
विष-अमृत
माया-मोक्ष
देह-आत्मा
प्रेम-स्मृतियाँ

निर्णय ने रोक दिया हैं कोई भी मंथन
देवता और असुर खामोश हैं
और लज्जित भी

समंदर के शोर की गूँज
आकाश के मौन से टकराकर
बदलती हैं हर रोज़ नमक में

थोड़ा सा नमक खानें में काम आता हैं
और बहुत सारा दफनाने में.


बुधवार, 17 सितंबर 2014

अपने समय के लिए. (अपने लिए.)











जब
एक छोटे से वृत्त में की जा रहीं हो
सबसे लम्बी यात्रा,
प्रेम को घिस-घिस कर किया जा रहा हो
पत्थर के जितना चिकना,
कल्पना से गढ़े जा रहें हो
अपने-अपने ज़रूरी झूठ,
और बहुत सारे शोर में दबायी जा रही हो
शून्य के मौन की टीस;

तब

कठिन फैसलों में प्रयोग करना  
सबसे कम शब्द,
सबसे गहरे प्रेम पर बहाना
सबसे कम आँसु,
सबसे कीमती स्मृतियों को करना
सबसे कम याद,
सबसे गहन चुम्बन में लेना
सबसे कम साँसे.

शब्दों का बैर होता हैं

संबंधो की गरिमा से,
आँसुओ से भी धुल जाता है
स्मृतियों का संताप,
सबसे कीमती स्मृतियों को याद नही किया जाता है
जिया जाता है 
जीवन की सीमा तक,
और, प्रेम में नही होना चाहिए व्यवधान 
साँसों का भी.

इसीलिए  
रची जाती है  
नितांत निजी कवितायें

जीया जाता है 
नितांत निजी जीवन.

लेकिन जानता हूँ 

इस सहेजी हुई निजता के बावजूद  
नमक मिले शब्दों, भीनी स्मृतियों 
और मीठी साँसों
की महक आती रहेगी
सदी के दस्तावेज़ों में लिखे
सही और गलत,
सच और झूठ, 
पाप और पुण्य,
-को खारिज करते
-पर प्रश्न उठाते
-से तठस्थ रहते
जीवन के शब्दकोष से

और सनद रहेगा कि - 
यथार्थ के समक्ष हमेशा जीवित रहते है स्वप्न 
भविष्य के एक सिरे को थामे रखती हैं स्मृतियाँ 
और 
समाजशास्त्र से कंधे मिलकर खड़ी हो सकती है 
एक छोटी सी कविता.