मंगलवार, 12 नवंबर 2013

इन्हीं सर्दियों में









इन सर्दियों मेरे पास जलाने के लिए
अलाव बहुत कम हैं
जमा हो गयी हैं ढेर सारी राख
इतनी सर्दियों से गुज़रते-निपटते


याद आते हैं मुझे सर्दियों में नंगे घूमते फ़कीर
लपेटे हुए भभूत
अपने ठिठुरते जिस्म पर
जो कांपना भूल चुका हैं


क्या हुआ ऐसा जो उस जिस्म ने चुना
राख का लबादा
बचने के लिए
ज़िन्दगी की सर्दियों से


इतिहास के विस्मृत अध्यायों से गुज़रता
उसके भग्नावेश सरीखे अस्तित्व पर
मै ढूँढता हूँ घर की दीवार फांदते हुए लगे किसी चोट के निशाँ को
-शायद सालो से जोट रहा हो मरहम की राह
माथे पर स्मृतियों की लकीरों को
-शायद खोज लू उसमे छूट चुका घर उसका
अपना


सब अदृश्य है
-छिपा हुआ
राख की इक झीनी सी, लेकिन ठोस परत के पीछे


कांप उठता हूँ ये जानकर
बिलकुल यूं ही
जैसे अभी
कांप रहा हूँ
देखते हुए
इस राख को


तभी इस बिलकुल वीरान सी रात
ठंडी होती जा रहीं आत्मा पर
महसूस होती हैं गर्माहट
स्याही मे घुले शब्दों की


मानो जाने-पहचाने हाथो ने
ओढ़ा दी हो इक दुशाला
और जला दिया हो सामने
यादो का अलाव


अचानक स्मृति में से
न जाने कहाँ चले जाता है
वो नंगा फ़कीर
अपने उस ठिठुरते जिस्म के साथ
जो कांपना भूल चुका हैं


क्या उसको भी मिल जाता हैं एक ठौर
कुछ उम्मीदों का
कुछ संभावनाओं का

इन्ही सर्दियों के बीच ?

बुधवार, 6 नवंबर 2013

नही!!...मेरे पास कोई एश-ट्रे नही हैं... यही एश-बोतल हैं जिसमे जमा हैं अब तक की सारी राख.. और सुलग चुकी..ख़त्म हो चुकी सिगरेट..  एश ट्रे मुझे हमेशा अजीब सी लगती हैं... और फिर अजीब सा ही तो हैं राख को ट्रे में रखना... ट्रे एक ऐसा शब्द हैं जो परोसने से जुड़ा हुआ हैं... कुछ चीज़े परोसने की कल्पना करना भी कितना अजीब -कितना वाहियात सा लगता हैं... हाँ...वाहियात... जैसे राख...जल चुकी सिगरेट...दुःख..अपनी स्मृतियाँ... क्या कहा??  ...लिखना भी परोसना हैं...  लेकिन फिर परोसने और सहेजने के बीच की रेखा का क्या होगा... कितना कुछ सुना-पढ़ा हैं इन महीन रेखाओं के बारे में... मसलन वो महीन रेखा पागलपन और सीजोफ्रेनिया के बीच होती हैं...या...जिद और जूनून के बीच होती हैं...प्रेम और पसंद के बीच होती हैं... महीन रेखाओं की ताकत को नज़रंदाज़ करने की बहुत सज़ाए मुक़र्रर हैं आपकी इस दुनिया में.. हाँ.. .क्या??...हमारी दुनिया...ओह..कहना चाहिए हमारी दुनिया...  हाँ...चाहिए भी तो कितना शक्तिशाली शब्द हैं ना...आप ठीक कहते हैं...चाहिए..मै भूल जाता हूँ अक्सर इस शब्द को...उसी तरह जैसे भूल जाता हूँ कि ये आपकी नही...मेरी भी..ओह...दअरसल हमारी दुनिया हैं...

क्या कहा...कि ये सब बातें मै केवल इसलिए कर रहां हूँ क्योकि मुझे एश-ट्रे का अपने पास ना होना जस्टिफाई करना हैं...हाहाहा!!...जस्टिफाई...हाँ..मुझे अभी-अभी लगा की ऐसा हो सकता हैं बिल्कुल...आपको अच्छा सा लगेगा ये जानकार कि मेरे दोस्त भी यही कहते हैं अक्सर कि मै कुछ भी जस्टिफाई कर सकता हूँ... वैसे क्या ये सच नही हैं की जस्टिफाई करने के लिए ही तो हम कितना कुछ करते है...तमाम बातें....प्रेम..विवाह..बच्चे..निर्वाह.... वगैराह वगैराह... और फिर भी कितना अजीब हैं की जिन भी पलो में थोड़ा भी ठहर पाते हैं...उनमे..उन कुछ पलो में सब कुछ अन-जस्टीफ़ाइड सा लगता हैं.. इस लिए तो दौड़ते रहते हैं शायद इतना...रुकना मतलब समय गँवाना...पाने से ज्यादा ज़रूरी ये हो जाता हैं..कि गंवाया ना जाए वो समय जिसमे कुछ..कुछ-नही..पाया जा सकता हैं....और इस तरह रच देते हैं हम वो खेल..जिसमे पाना...जीना सबसे आखिरी पायेदान पर पड़ा रहता हैं...

ओह्ह...क्या कहा आपने ...आपको जाना होगा...ज़रूरी काम हैं...हाँ...बिलकुल...ज़रूरी काम तो करने ही चाहिए..लेकिन अभी इतनी शाम-ढले यहाँ से रिक्शा आसानी से नही मिलेगा...लोग मान लेते हैं यहाँ कि शाम ढलने के बाद इधर-उधर जाने वाले बहुत कम हो जातें हैं..इसीलिए...कुछ-कुछ देर पर लेकिन बस निकलती हैं...कोने पर आएगी तो हॉर्न सुनाई देगा..तब ही निकलिएगा...हाँ...सहीं कहते हैं आप..सर्दियां आ रहीं हैं..कम्बल-रजाई का मौसम... अरे नही, मुझे भी बहुत पसंद हैं ये मौसम...अँधेरा जल्दी हो जाता हैं इसमें...और दिन में धुप चुभती नही हैं..और आप कितना भी चलते जाएँ..पसीने और प्यास से तो बेहाल नही होते... क्या कहा आपने...थकावट!!...अरे नही...हम लोगो को दरसल गहरे में थकावट की आदत हो चुकी हैं...रुके-रुके पैदा होने वाली थकावट..चलने में जी-बदलने का सुख ही ज्यादा होता हैं..चलने कि थकावट तो नही ही हो पाती...सही कहा आपने..चलना भी तो सीमित दायरे में ही होता हैं ना...कि वापस लौट कर आ सकें...हर बढते हुए कदम में आगे देखने की बजाये मन का एक हिस्सा दूरी मापता रह जाता हैं बस... वैसे आपको नही लगता की दूरी माप कर रखने की हमे आदत हो गयी हैं?? ओह...आपको ऐसा नही लगता... हाहाहाहा!!!! ... देखिये मैंने कहा था ना की आपकी और मेरी दुनिया अलग-अलग हैं... अरे... आप उस तस्वीर में क्या देख रहें हैं... ऑस्कर वाइल्ड की हैं...मेरे एक दोस्त को बहुत पसंद हैं वो... अच्छा....उस पर जो लिखा हैं... कि .... ओह... आप उठ क्यों रहे.... आपको हॉर्न सुनाई दिया क्या???? अच्छा... हाँ... तो फिर जाइए... जाते हुए को दुबारा नही रोकते. अलविदा.. ... यूं भागिए मत.... हाँ... क्या???.. अगली बार एश-ट्रे.......





शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

निष्कासन. विस्थापन.








अयोध्या से निष्कासित हुए थे राम
और मुहम्मद मक्का से
विस्थापित हैं कश्मीरी पंडित कश्मीर से
और लामा तिब्बत से
मेरी कविता से निष्कासित है प्रेम
मेरी कविता से निष्कासित है एक स्त्री

शहर घुस आया हैं मेरी कविता मे
जिसमे विस्थापित हूँ मैं

एक दिन झुक जाता हैं मक्का
मुहम्मद के सामने
और शुरू होती हैं इक धर्म की गौरव गाथा
एक दिन सजती हैं अयोध्या
चौदह सालो के विरह के बाद
आज तक जलते हैं उसके दीप

हर निष्कासन का एक सुखद अंत होता हैं.

लेकिन
यहाँ
जम सा गया हैं समय किसी कोने मे
स्मृति की शीत-दिशा में बहते-बहते.

सपनो में उन्हें
अब भी दिख जाते हैं
चिनार के पेड़.
सूखती आँखों में कभी-कभी उतर आता हैं
चिनाब का पानी

"बुद्धं शरणम् गच्छामि"
"संघम शरणम् गच्छामि"
"धम्मम् शरणम् गच्छामि"
के उद्घोष के बीच
अचानक आने लगता हैं एक अशांत मंत्र
"तिब्बत
 तिब्बत
 तिब्बत"

निष्कासन से नहीं
भय मुझे विस्थापन से हैं


जिसमें होता है
शून्य को ताकता
एक अंतहीन सा इंतज़ार

कभी ना ख़त्म होने वाला इंतज़ार |