गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

शहर - १










शहर को लड़ना पड़ता हैं
जंगल से
बसने से पहले  |

शहर बस जाता हैं
एक दिन |

आती हैं रात को अब भी
वहाँ आदिम आवाज़े
जंगल से...
भीतर से...
बाहर से...

जंगल कहीं नही जाता |

मंगलवार, 12 नवंबर 2013

इन्हीं सर्दियों में









इन सर्दियों मेरे पास जलाने के लिए
अलाव बहुत कम हैं
जमा हो गयी हैं ढेर सारी राख
इतनी सर्दियों से गुज़रते-निपटते


याद आते हैं मुझे सर्दियों में नंगे घूमते फ़कीर
लपेटे हुए भभूत
अपने ठिठुरते जिस्म पर
जो कांपना भूल चुका हैं


क्या हुआ ऐसा जो उस जिस्म ने चुना
राख का लबादा
बचने के लिए
ज़िन्दगी की सर्दियों से


इतिहास के विस्मृत अध्यायों से गुज़रता
उसके भग्नावेश सरीखे अस्तित्व पर
मै ढूँढता हूँ घर की दीवार फांदते हुए लगे किसी चोट के निशाँ को
-शायद सालो से जोट रहा हो मरहम की राह
माथे पर स्मृतियों की लकीरों को
-शायद खोज लू उसमे छूट चुका घर उसका
अपना


सब अदृश्य है
-छिपा हुआ
राख की इक झीनी सी, लेकिन ठोस परत के पीछे


कांप उठता हूँ ये जानकर
बिलकुल यूं ही
जैसे अभी
कांप रहा हूँ
देखते हुए
इस राख को


तभी इस बिलकुल वीरान सी रात
ठंडी होती जा रहीं आत्मा पर
महसूस होती हैं गर्माहट
स्याही मे घुले शब्दों की


मानो जाने-पहचाने हाथो ने
ओढ़ा दी हो इक दुशाला
और जला दिया हो सामने
यादो का अलाव


अचानक स्मृति में से
न जाने कहाँ चले जाता है
वो नंगा फ़कीर
अपने उस ठिठुरते जिस्म के साथ
जो कांपना भूल चुका हैं


क्या उसको भी मिल जाता हैं एक ठौर
कुछ उम्मीदों का
कुछ संभावनाओं का

इन्ही सर्दियों के बीच ?

बुधवार, 6 नवंबर 2013

नही!!...मेरे पास कोई एश-ट्रे नही हैं... यही एश-बोतल हैं जिसमे जमा हैं अब तक की सारी राख.. और सुलग चुकी..ख़त्म हो चुकी सिगरेट..  एश ट्रे मुझे हमेशा अजीब सी लगती हैं... और फिर अजीब सा ही तो हैं राख को ट्रे में रखना... ट्रे एक ऐसा शब्द हैं जो परोसने से जुड़ा हुआ हैं... कुछ चीज़े परोसने की कल्पना करना भी कितना अजीब -कितना वाहियात सा लगता हैं... हाँ...वाहियात... जैसे राख...जल चुकी सिगरेट...दुःख..अपनी स्मृतियाँ... क्या कहा??  ...लिखना भी परोसना हैं...  लेकिन फिर परोसने और सहेजने के बीच की रेखा का क्या होगा... कितना कुछ सुना-पढ़ा हैं इन महीन रेखाओं के बारे में... मसलन वो महीन रेखा पागलपन और सीजोफ्रेनिया के बीच होती हैं...या...जिद और जूनून के बीच होती हैं...प्रेम और पसंद के बीच होती हैं... महीन रेखाओं की ताकत को नज़रंदाज़ करने की बहुत सज़ाए मुक़र्रर हैं आपकी इस दुनिया में.. हाँ.. .क्या??...हमारी दुनिया...ओह..कहना चाहिए हमारी दुनिया...  हाँ...चाहिए भी तो कितना शक्तिशाली शब्द हैं ना...आप ठीक कहते हैं...चाहिए..मै भूल जाता हूँ अक्सर इस शब्द को...उसी तरह जैसे भूल जाता हूँ कि ये आपकी नही...मेरी भी..ओह...दअरसल हमारी दुनिया हैं...

क्या कहा...कि ये सब बातें मै केवल इसलिए कर रहां हूँ क्योकि मुझे एश-ट्रे का अपने पास ना होना जस्टिफाई करना हैं...हाहाहा!!...जस्टिफाई...हाँ..मुझे अभी-अभी लगा की ऐसा हो सकता हैं बिल्कुल...आपको अच्छा सा लगेगा ये जानकार कि मेरे दोस्त भी यही कहते हैं अक्सर कि मै कुछ भी जस्टिफाई कर सकता हूँ... वैसे क्या ये सच नही हैं की जस्टिफाई करने के लिए ही तो हम कितना कुछ करते है...तमाम बातें....प्रेम..विवाह..बच्चे..निर्वाह.... वगैराह वगैराह... और फिर भी कितना अजीब हैं की जिन भी पलो में थोड़ा भी ठहर पाते हैं...उनमे..उन कुछ पलो में सब कुछ अन-जस्टीफ़ाइड सा लगता हैं.. इस लिए तो दौड़ते रहते हैं शायद इतना...रुकना मतलब समय गँवाना...पाने से ज्यादा ज़रूरी ये हो जाता हैं..कि गंवाया ना जाए वो समय जिसमे कुछ..कुछ-नही..पाया जा सकता हैं....और इस तरह रच देते हैं हम वो खेल..जिसमे पाना...जीना सबसे आखिरी पायेदान पर पड़ा रहता हैं...

ओह्ह...क्या कहा आपने ...आपको जाना होगा...ज़रूरी काम हैं...हाँ...बिलकुल...ज़रूरी काम तो करने ही चाहिए..लेकिन अभी इतनी शाम-ढले यहाँ से रिक्शा आसानी से नही मिलेगा...लोग मान लेते हैं यहाँ कि शाम ढलने के बाद इधर-उधर जाने वाले बहुत कम हो जातें हैं..इसीलिए...कुछ-कुछ देर पर लेकिन बस निकलती हैं...कोने पर आएगी तो हॉर्न सुनाई देगा..तब ही निकलिएगा...हाँ...सहीं कहते हैं आप..सर्दियां आ रहीं हैं..कम्बल-रजाई का मौसम... अरे नही, मुझे भी बहुत पसंद हैं ये मौसम...अँधेरा जल्दी हो जाता हैं इसमें...और दिन में धुप चुभती नही हैं..और आप कितना भी चलते जाएँ..पसीने और प्यास से तो बेहाल नही होते... क्या कहा आपने...थकावट!!...अरे नही...हम लोगो को दरसल गहरे में थकावट की आदत हो चुकी हैं...रुके-रुके पैदा होने वाली थकावट..चलने में जी-बदलने का सुख ही ज्यादा होता हैं..चलने कि थकावट तो नही ही हो पाती...सही कहा आपने..चलना भी तो सीमित दायरे में ही होता हैं ना...कि वापस लौट कर आ सकें...हर बढते हुए कदम में आगे देखने की बजाये मन का एक हिस्सा दूरी मापता रह जाता हैं बस... वैसे आपको नही लगता की दूरी माप कर रखने की हमे आदत हो गयी हैं?? ओह...आपको ऐसा नही लगता... हाहाहाहा!!!! ... देखिये मैंने कहा था ना की आपकी और मेरी दुनिया अलग-अलग हैं... अरे... आप उस तस्वीर में क्या देख रहें हैं... ऑस्कर वाइल्ड की हैं...मेरे एक दोस्त को बहुत पसंद हैं वो... अच्छा....उस पर जो लिखा हैं... कि .... ओह... आप उठ क्यों रहे.... आपको हॉर्न सुनाई दिया क्या???? अच्छा... हाँ... तो फिर जाइए... जाते हुए को दुबारा नही रोकते. अलविदा.. ... यूं भागिए मत.... हाँ... क्या???.. अगली बार एश-ट्रे.......





शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

निष्कासन. विस्थापन.








अयोध्या से निष्कासित हुए थे राम
और मुहम्मद मक्का से
विस्थापित हैं कश्मीरी पंडित कश्मीर से
और लामा तिब्बत से
मेरी कविता से निष्कासित है प्रेम
मेरी कविता से निष्कासित है एक स्त्री

शहर घुस आया हैं मेरी कविता मे
जिसमे विस्थापित हूँ मैं

एक दिन झुक जाता हैं मक्का
मुहम्मद के सामने
और शुरू होती हैं इक धर्म की गौरव गाथा
एक दिन सजती हैं अयोध्या
चौदह सालो के विरह के बाद
आज तक जलते हैं उसके दीप

हर निष्कासन का एक सुखद अंत होता हैं.

लेकिन
यहाँ
जम सा गया हैं समय किसी कोने मे
स्मृति की शीत-दिशा में बहते-बहते.

सपनो में उन्हें
अब भी दिख जाते हैं
चिनार के पेड़.
सूखती आँखों में कभी-कभी उतर आता हैं
चिनाब का पानी

"बुद्धं शरणम् गच्छामि"
"संघम शरणम् गच्छामि"
"धम्मम् शरणम् गच्छामि"
के उद्घोष के बीच
अचानक आने लगता हैं एक अशांत मंत्र
"तिब्बत
 तिब्बत
 तिब्बत"

निष्कासन से नहीं
भय मुझे विस्थापन से हैं


जिसमें होता है
शून्य को ताकता
एक अंतहीन सा इंतज़ार

कभी ना ख़त्म होने वाला इंतज़ार |

सोमवार, 28 अक्तूबर 2013

रोना. बुद्ध होना.

जानते हो 
उस दिन 
इतने प्रयास, निराशा, कातरता, 
व्रत, खोज, जागरण,
अनिद्रा, 
और भूख 
से थका वो भिक्षु 
सुजाता की खीर खाने के तुरंत बाद 
रोया था 
आखिरी बार 

बुद्ध होने से पहले |

बुद्ध का रोना
बाहर छोड़ दिया गया
सूत्रों, पित्तको,
और जातक कथाओ से भी
इस तरह एक भिक्षु को बनाया गया भगवान्

बुद्ध होने के बाद |

जीवन से बाहर छूट गया सदा के लिए
भिक्षु का रोना.

बुद्ध का होना.


                                                                                   

रविवार, 27 अक्तूबर 2013

जीवन- एक कोलाज



बड़ी-बड़ी होती हैं कहानियाँ, कवितायें 
जीवनी और आत्मकथाएं 

जीवन छोटा-छोटा ही होता हैं 
छुपा, ठहरा, चलता, अलसाता, 
सुस्ताता 
उन बड़ी-बड़ी इकाईओं की धुप-छाँव में 
मिल जाता हैं 
कभी 
यूं ही 
अचानक 
कुछ पलों में 
कुछ पलों को 

जैसे 

उस रोज़ मिली थी 
गुलज़ार की
सितारे गिनते-गिनते
ज़ख़्मी हुई उँगलियों को  
अरसे बाद पहने एक पुराने कोट की 
नीचे वाली बायीं जेब में 
छिप कर बैठी 
इलाईची 
'तुम शायर ना होते अगर//तो बड़े झूठे आदमी होते'







कवि : नींद, सपने और कविता




पलट कर मत देखना कभी 
कहता है कवि 
सपनो को 
विदा करने से पहले 
पुरखो की रह पर 
गंगा की धार मे 

इसके बाद कवि को 
फिर कभी नहीं आते सपने 
उसको आती है अब केवल नींद 
एक लम्बे-निष्प्रयोजन जागरण के बाद 

उसका पूरा जीवन अब एक इंतज़ार है 
-जागरण में निद्रा का 
-निद्रा में सपनो का 
-सपनो को एक पुकार का 

हर इंतज़ार को समेटे एक मौन हैं 
जिसमे लिखी जाती हैं कवितायें 
जिन्हें कभी नहीं पढ़ा जाता 
-नहीं पढ़ा जा सकता 
सभ्य समाज मे 


अनलिखी डायरी से. (मै डायरी नही लिखता).




रात का एक पहर है .... और उस पर अँधेरे की सख्त पहरेदारी. फिर भी कही से ये पहर निकला जा रहा हैं. रिस रहा है धीरे धीरे.
और उतरता जा रहा है इक काग़ज़ पर. मुझसे होकर.

अभी अभी इस डायरी पर पहला अक्षर लिखा हैं  'सूरदास'.

बिलकुल यूं ही जैसे अरसा पहले एक डायरी पर 'कृष्ण' लिखा था.
(फिर आज तक उस पर कुछ नहीं लिखा).

यूं ही.

अभी अचानक एक रिश्ता लगा दोनों में. एक रिश्ता- एक सम्बन्ध समझ आया. कितना कुछ कितनी बाद में समझ आता हैं - होता हमेशा से है - बस समझ बाद में आता हैं.
समझ के साथ बहुत कुछ और भी आता हैं- संताप, दुःख, पछतावा, प्रेम, आमंत्रण, अवसाद, अकेलापन, धुआं. कविता. .... और देर से आने वाली समझ के साथी-सहोदर समझ से भी ज्यादा गुस्से में होते हैं. उनको अपने अस्त-व्यस्त कमरे में बैठने का आमंत्रण देता हूँ मैं इतनी रात गए मेहमानों के आने से उपजी खीज के साथ.
खीज बहुत थोड़ी देर टिकती हैं क्योकि समझदार लेखक को अचानक याद आता हैं की ये सब अपने घर ही तो लौटे हैं... इस कमरे के भीतर रहने वाला कमरा इनका ही तो घर हैं.
अपने घर वापस आये लोगो से यूं नहीं पुछा करते (बताया न लेखक समझदार हैं!) ...वरना पूछता - "आज कैसे??"

गैर-ज़रूरी चाय-पानी और उससे भी ज्यादा गैर-ज़रूरी बातें लेकर मै वापस कमरे में आया ही था कि देखा कमरा खाली हैं. दरवाज़े से तो कोई नहीं गया.
मैंने सोचा ही नहीं की कमरे के अंदर लौट कर आया कमरा भी तो खाली था. वो सब वही चले गए होंगे आँखों की नज़र से बचके.
वैसे भी उस कमरे और उसके खालीपन के बारे मे कौन सोचता हैं.

सोचने के लिए मोदी और राहुल हैं, प्याज के बढ़ते दाम हैं, सेमेस्टर एग्जाम और असाइनमेंट हैं(बाप रे, माँ रे (लेखक एक भोला और सुसंस्कृत बच्चा हैं जिसे अक्सर माँ-बाप की याद सताती हैं!!),  और क्रिकेट सीरीज में ऑस्ट्रेलिया से पिट रही अपनी टीम हैं.
तो कमरों और उनके खाली-पन को भूल सोचने लायक चीजों के साथ मैं अपने बिस्तर की और बढ़ता हूँ तो देखता हूँ की कविता सिरहाने ही बैठी हैं.
सब चले गए तो ये यहाँ क्यों?
....(ये हमेशा यूं ही रहेगी... साथ.. चुप... सबके चले जाने के बाद भी ... अभी लेखक को ये आगे समझ आएगा..ज़िन्दगी में).

खैर, उसको मैं वही रहने देता हूँ और चाय-पानी को गैर-ज़रूरी से अचानक ज़रूरी में बदलता पाता हूँ. तभी ध्यान आया कि तश्तरी में गैर ज़रूरी बाते भी तो थी ..इनका क्या किया जाए. यूं तो नही छोड़ सकते.

सोचता हूँ थोड़ी देर. फिर पाता हूँ खुद को बैठा इस स्क्रीन के सामने जहाँ बातो को अब करीने से लगा रहा हूँ.
हाँ... वहीँ बातें.... गैर ज़रूरी बातें.

____________________________________________________ 1:30 am

इतना लिखा ही है अभी कि सिगरेट बुझ गयी हैं. (अच्छी सी सिगरेट हैं - इसकी राख दूसरीयों की तरह अधजली लकड़ी जैसे ढोस नही दिखती, भरभरा कर गिरती रहती हैं राख की तरह. ठोस राख बहुत झूठी लगती हैं. बहुत. असहनीय. बदसूरत).
बुझे हुए सिरे की गोलाई के भीतर अब कोई सुलगन नहीं हैं- कोई चिंगारी नहीं- काफी अन्दर तक अब केवल राख ही हैं.. कितना कुछ जलता रहा..राख में बदलता रहा.. भीतर ...पता ही नहीं चला... पता चला तब तक बची थी केवल राख. इसके लिए...अभी इस क्षण..एक अपनापन सा लगता हैं... ... जीवन....कुछ पल.... एक समझ- जो शब्दों की मोहताज नहीं.

बहरहाल इसको फिर से सुलगाया जा सकता हैं - बशर्ते अभी सोने का इरादा ना हो और मालूम हो की सिगरेट में अब भी बहुत कुछ हैं. शेष. ....
मै बिना पीछे मुड़े ही अपना नीला पारदर्शी लाइटर टटोलता हूँ. पीछे मुड़कर देखना बहुत कठिन लगता है कई बार.
अभी तो बहुत जागना है मुझे. और बहुत कुछ रह गया है. ...शेष. ..
याद करना.... लिखना... जीना..

____________________________________________________1:44 am

लगता है ये रात बहुत खिंच जाएगी. काग़ज़.., ..कलम, ..सिगरेट ...किताब के बहाने. अरे! ज़िन्दगी लिखना तो भूल ही गया. लेकिन ठीक ही है... ज़िन्दगी लिखूंगा तो कितना कुछ और लिखना होगा. इतिहास, प्रेम, उजास, गर्माहट, शून्य,.. ... और ना जाने क्या-क्या. ..
और फिर ना जाने कितने काग़ज़ यू हीं स्याह हो जायेंगे ..और स्याही ना जाने कब काग़ज़ पर शब्द की जगह एक फैलते दाग़ की तरह दर्ज होने लगेगी. लिखते हुए ही दुःस्वप्न सा लगता हैं. दुःस्वप्न...-जागे में ही ..... नहीं भाई... ई न चोलबे.
तो अब सोते हैं.

शुभरात्री!! (अजब मेल है शब्दों का... अंग्रेजी का एक शब्द -oxymoron ध्यान आ गया.
 :p

_________________________________________________2:08 am

शनिवार, 26 अक्तूबर 2013

कविता- एक कहानी




पहाड़ो के पास
रहने वाली लड़की
करती थी उसे याद
ये राज़ बस एक छोटे से पौधे को पता था.

लड़का नदी के लिए
लिखता था सन्देश
और भेज दिया करता था लड़की को
चिट्ठी ले जाने वाला बादल सब जानता था.

ये दिन थे
नदियों के, पहाड़ो के,
कविताओं के, सम्भावनाओं के
जिनसे होकर बह रहा था जीवन.

फिर,
-इक दिन
सभ्यता का आगमन हुआ
पैगम्बरों और पैगामो
न्यायाधीशों और नियमो
और शहरों के साथ

समाज और संबंधो के खांचो से लदा

और जल्दी ही ऐलान हुआ
कि पर्वतो को तोड़कर जमा किया जाए सामान
और नदी पर बनाए जाए असंख्य बांध -
-बाढ़ के खतरों को टालने के लिए
-बहाव के सही उपयोग के लिए |

बस
फिर इसके बाद कुछ भी नहीं हुआ दुनिया में
.....

लड़का-लड़की और प्रेम निर्वासित हो गए, इतिहास में,
खापो और पंचायतो के फरमानों से बचते
दुनिया का आखिरी कोना तक छान लेने के बाद.
शहर फैलता रहा
अतिक्रमित करता कस्बो-गाँवों को
मन के सुदूर कोनो तक.
नदियाँ सूखती रहीं
कलुषित-प्रदूषित हो
नाला हो जाने तक.
पर्वत टूटते रहे
अट्टालिकाओ के फर्शो में
बिछ जाने को.

कवितायें, यादें और चिट्ठियाँ फ्रायडियन थाती हो गयी.

लगभग सबकुछ इसी घोषणा के साथ समाप्त होता हैं
पर कविता की साँसों में कुछ सूचनाएं अटकी हैं.... ...

कि
इक छोटे से पौधे की कलियों ने
खिलने से इनकार कर दिया

कि
एक बूढ़ा बादल किसी रेगिस्तान में जाकर
बरस गया

कि
कभी अचानक ही किसी रोज़
केदारनाथ तीर्थ
कब्रगाह में बदल जाता हैं

कि
हर बरस कोसी नदी
बाँध का सीना चीर
आवारा हो जाती हैं

और सुना है
सुदूर अंडमान के किसी पर्वत की छाती में
आज भी धधक रहा है
एक गुप्त ज्वालामुखी |

शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

अँधेरे में कविता - १








उसने पूछा 

अब कविता नही लिखते?
मैंने सोचा 
ये शहर बहुत छोटा हैं 
और दुनिया बहुत बड़ी. 

उसने पूछा 
यूं ही चुप रहोगे ?
मैंने कहा 
प्रेम बहुत निजी हैं 
बाकी सब सामाजिक.

उसने पुछा 
क्या दुनिया सचमुच गोल हैं?
मैंने देखा 
दिन जल्दी बीत गया 
शाम ढल आयी हैं.

उसने पूछा 
हुआ क्या हैं?
मुझे लगा 
यहाँ जो भी न्यायाधीश नहीं हैं 
वो कठघरे में खड़ा हैं.

उसने शायद कहा ...
प्रेम..... .............?
जाने से पहले आखिरी बार 
मैंने उसकी आँखों में देखा.

~~~~~~

"वजह की तलाश में
बेवजह भटकते-भटकते 
खो मत जाना 
खयालो के उस बियाबान में 
जहाँ होता हैं 
इतना नीरव अन्धकार 
कि नहीं सूझता 
हाथ को हाथ
बुद्धि को तर्क 
और ह्रदय को प्रेम"

~~~~~~

शाम ठहर गयी
सब एक-दम शांत था 


वो दोनों अब समंदर को देख रहे थे 
बूझने की कोशिश मे 
कि ये सैलाब के बाद का सन्नाटा हैं 
या तूफ़ान से पहले की खामोशी ....... 







*चित्र हलें कोत्तले और डेन वर्नर के 

गुरुवार, 11 जुलाई 2013

'काटना शमी का वृक्ष पद्मपंखुरी की धार से'

"..उपसंहार......"
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उसका पहला पन्ना पलटते हुए कोने पर टंगे एक थोड़े विस्मृत लेकिन जाने-पहचाने  शब्द को देखकर पूछा था उसने कि इसका मतलब क्या होता है? ...."शुरुआत??????"

इस भोले से प्रश्न पर अंतर्मन की पहली अभिव्यक्ति एक सहज मुस्कान के रूप मे थी. किल्लोल की परिधियो को छूती मुस्कान. मुस्कान - जो उसके होने की प्रतिलिपि थी. (वैसे भोलापन उस प्रश्न में था या उसका माध्यम बनी आवाज़ में , उसकी नासमझी में या उस स्निग्धता में जो उन अनाम पलों में अपना एक अलग वातावरण-कवच बना लेती थी - उसे इस लम्बे अंतराल के बाद याद नही. हाँ. लंबा अंतराल...).

-"नहीं, conclusion..." बोलने के बाद उसने आत्मसंवाद सुना  --"अंत जैसा कुछ. ....निष्कर्ष.".

एक प्रश्न और एक उत्तर के बीच एक महाकाव्य के नाटकीय मंचन के सुलगते चरम क्षणों में से कुछ की राख खारी नमी लिए हुए वातावरण और ढलती शाम की उदासी में हवा से घुलने-मिलने की कोशिशे करने लगी.

"यज्ञ की राख का यूं उड़ना तो अपशकुन होता है ना...!!!"... -क्षितिज पर बचे कुछ काले बादलो को देखते हुए उसने सोचा था शायद. 

उपसंहार की प्रतिछाया में शुरू हुए उपन्यास की आखिरी पंक्ति आ पहुँची था. अनचाहे उपसंहार तक पहुचने का एहसास ......इक दर्द जैसा कुछ ....पहचाना सा लगता हैं. उस दर्द के साथ अंतिम शब्दों लग जाते हैं...

.... "कवि का धर्मं मनुष्य की आत्मा को बचाना नही, वरन उसे बचाने योग्य बनाना है... ..."
.....................................................................................................................................
'...उपसंहार लिखते हुए कतराता हूँ, संहार की बू आती हैं...'^


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सबसे पहले तुम अपने प्रेम से मुंह मोड़ोगे 
और अंत में अपनी आत्मा से.
इस पहले आत्मघाती कदम और उस दुखद परिणति के बीच 
एक लंबा शीत यातनाकाल होगा. 

Love is the only saviour.
...................................................................................................................................
'....मेरी देह से आग निकाल लो, तुम्हारा दिल बहुत ठंडा है....'*


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उसका ईश्वर खंडित हो चुका था. या वो मूर्ती जिसे वो अदना सा बुतपरस्त ईश्वर समझ बैठा था. .. अब खंडित थी. 
पराजित ईश्वर असहनीय था.
(मानो जीवन ना हो- मल्लयुद्ध हो. ....बुतपरस्तो की भी सनक ना कुछ अजब ही होती हैं..!!)

"-अबबबबबबबब ??!!????"
"-या तो बुतपरस्ती छोड़ दे....
......या पूरा काफिर हो जा.."

"-क्या मंदिर की संभावना होगी फिर कभी...??"
"-सवाल मंदिर या मूर्ती का नहीं - ईश्वर का हैं....      और वही अकेली संभावना हैं.

"-वो ये संभावना पहचान लेगा...?"
"-सवाल नामाकूल हैं- और बेमतलब. जीवन रुकता नही. प्रेम-ईश्वर-कविता जड़ता में नही.....
.......सब गतिशील रहेगा. चैतन्य. जीवन के साथ....
.... रुकेगा नही. 
किसी बुतपरस्त के लिए तो कभी भी नही..."

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आशा में कहीं इक प्रार्थना होती हैं और निराशा के गहरे में उपहास. उपर्युक्त लेख तीसरी संभावना की ओर इंगित करता हैं. भारतीय राजनीति के तीसरे मोर्चे की तरह !!! 

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बक रहा हूँ जूनून में क्या-क्या कुछ 
कुछ ना समझे खुदा करे कोई 

__________________________ग़ालिब 

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'^ * कुमार अनुपम और गीत चतुर्वेदी की कविता की एक पंक्ति.


शुक्रवार, 28 जून 2013

चलो किसी रोज़



चलो किसी रोज़
उन लफ्ज़ो के मानी खोजे
जो चुप्पी के अंधेरो मे
-अनजाने के डर से-
सन्नाटो की दीवारों से यू चिपके कुछ
कि ज़हन में बुलाने पर वापस
अब वो लफ्ज़ नहीं
घिसटते-चलते
कुछ दीवारे आती हैं

............................................................................

चलो किसी रोज़
इतनी कही-अनकही बातो
और पर्दा-बेपर्दा जज्बातों
के बीच पल रहे
अपने अपने डर से पूछे
उसके होने के मानी

कि
आज और कल के उलझाव में
ऐसा क्या हैं
जो रिश्तो की गांठो को कसने वाले हाथ
उधेड़ने लगते हैं यादों से बुने स्वेटर

.............................................................................

चलो किसी रोज़
रो-हँस कर
बहा दे इतना समंदर
कि पूरी ज़िन्दगी में
कभी नमक कम न हो.



बुधवार, 19 जून 2013

कुछ खोया, कुछ गुम हो गया.

माँ को व्यवस्थित चीज़े पसंद है. अभी शाम को बाहर चहलकदमी के लिए गया और वापस आया तो पाया की निर्मल वर्मा का उपन्यास कमरे के दूसरे कोने में किताबो की रेक में रखा जा चुका है. उसका बुक-मार्क कलम वाले  डिब्बे में सलीके से खोस दिया गया है. एक रजिस्टर जिसे मै खुला छोड़कर गया था उसे बंद करके सामने मेज पर ही दीवार के सहारे खड़ा कर दिया गया है. संक्षेप में - सब कुछ व्यवस्थित सा हो गया है.

लेकिन मेरी कलम जिससे मै लिख रहा था - एक बड़ी साधारण सी कलम थी कि बस लिखकर ख़त्म कर भूल जाऊंगा- कहीं दिख नहीं रही. वहीँ, खुली हुई रजिस्टर पर ही रखी थी और उसकी रोशनाई कुछ बैंगनी सी थी. उससे लिख कर अचानक अपनी लिखावट के प्रति प्रेम उपज रहा था. (मेरे जैसे आत्ममुग्ध व्यक्ति के लिए भी अपनी लिखावट से प्रेम विरल है. लिखावट के प्रति इस विरल प्रेम का एक कारण मेरे शिक्षक है जिन्होंने ना जाने कितनी मरतबा मेरी लिखावट को लेकर मेरा सार्वजनिक अभिनन्दन किया है और इंक पेन से ले कर जैल पेन तक के इस्तेमाल में मेरा एक समान कबीरपंथी भाव देख कर अपने बाल नोचे हैं. गालो पर पड़ने वाली हथेलियों की छाप और हथेलियों पर छड़ी के निशाँ सरीखी यादो को मैंने अपने बड़प्पन में भुला दिया है.)  बहरहाल अब तक उस कलम का केवल ढक्कन दिखा है. कोने में वो भी बड़े व्यवस्थित ढंग से रखा है. जाने क्यों ढक्कन के बिना पेन अधूरा सा हो जाता है. लगता है अब ख़त्म हो गया है. जाने कितनी ही बार ऐसा हुआ है की कई बिना ढक्कन वाले पेन के रखे होने के बाद भी कोई कलम ना होने का आभास और नयी कलम लाने की ज़रुरत महसूस हुयी है. ये अधूरेपन की त्रासदी है. जीवन की भी.

अब जब ढक्कन ही दिख रहा है तो लगता है कलम गुम हो चुकी है. गुम- ये शब्द बहुत पुराना है मेरी स्मृति में. इसका पहला परिचय मेरे पहले स्कूल, मेरे पहले लंच बॉक्स और पानी की बोतल और मेरे बचपन की दोस्ती की पहली स्मृति से जुड़ा है. (कितनी ही यादें चुपचाप अस्तित्व के एक कोने में बनी रहती है. अपनी उम्र जीते हुए. कुछ स्मृतियाँ- ख़ास तौर पर पहली बार की यादें तो ताउम्र एक-सी रहती है. पहला स्कूल, पहले दोस्त, पहला प्रेम. सजीव. स्पष्ट.). उस छोटे से शहर की मेरी गली के दुसरे छोर ही मेरा पहला स्कूल था. मेरा पहला स्कूल. वहां पर बने मेरे पहले दोस्त परवीन (नाम शायद प्रवीन रहा हो पर मुझे परवीन ही याद हैं) की बोली मुझसे कुछ अलग थी.  (उस छोटे से शहर की एक गली में इतने तरह के लोग रहते थे और यहाँ  कल न्यूज़ चैनल पर आ रही एक बहस में एक तथाकथित राष्ट्र कवि 'एक भाषा एक संस्कृति' को एक राष्ट्र का पर्याय बता रहे थे. जबकि उनके राष्ट्र की परिभाषा में उस छोटे से  शहर की एक गली भी नहीं समाती). अपनी बोली में उसने मेरी पानी की बोतल के खो जाने को गुम हो जाना कहा था. बचपन की थोड़ी सी तुतलाहट और दोस्त की मम्मी से दोस्त की शिकायत करने के उल्लास से उपजे स्पेशल इफेक्ट्स के साथ. ये शब्द उसी तरह ज़ेहन में रह गया. बड़े होने की प्रक्रिया में उसके खो जाने - या गुम हो जाने के बाद भी. हाँ, गुम हो जाने के बाद भी.

पता नही क्यों लगता है खो जाने और गुम हो जाने के लिए मन ने अलग अलग खांचे बना लिए हैं. खो जाने में खोने वाले को अपनी कुछ भूल सी महसूस होती है, और ये एहसास भी की जो खो गया है अब वो मिलेगा नहीं. और वह भी एक अजीब सी बेबस स्वीकार के साथ कि जो खोया है वो भूगोल या काल के किस हिस्से में है ये मालूम है. और जिसे हाथ बढ़ाकर जब चाहे छु सकते है. कर सकने और सचमुच करने की बीच की दूरी मे खो देने के संत्रास का मर्म छिपा है.

गुम हो जाने मे एक स्वतन्त्रता की झलक हैं. गुम हो जाने वाले की, गुम कर देने वाले की और समय की. और आशा-निराशा का- चोर पुलिस वाला, इश्वर शैतान वाला खेल भी नही हैं. कोई इंतज़ार नही. कोई ग्लानी नही.

बहरहाल कलम को लेकर यही भावना है - कि कलम गुम हो चुकी है. या परवीन की तरह कहूँ तो कलम गुम गयी है. बहुत कुछ गुम जाता है व्यवस्था के स्थापन मे, बड़े होने की प्रक्रिया मे.
और बहुत कुछ हम खो देते है.


मैंने रजिस्टर फिर खोल ली है. लेकिन ये वो नही है जो मैंने बंद की थी. छोड़ कर जाने और फिर लौट कर आने के बीच बहुत कुछ बदल जाता है. कभी कभी सब कुछ.  इसके झक-सफ़ेद से अध्-लिखे पन्ने पर रखी कलम के अलावा कई अनलिखे शब्द, सही विन्यास की राह तकते वाक्य और ठहरने के लिए बमुश्किल तैयार हुए कई आवारा खानाबदोश ख़याल गायब हैं. शायद ढुलक कर नीचे गिर गए होंगे जब माँ ने रजिस्टर बंद किया होगा और बुहार ले गया होगा उनको कोई मध्यवर्गीय घरो में कूड़े में पायी जाने वाली कुछ महीन धूल और  कुछ-एक काग़ज़ के टुकड़ो के साथ.

'मै उतना ही थमा हूँ, जैसे कोई प्रार्थना हूँ'

मंगलवार, 28 मई 2013

खण्डहर- भाग २




हर गुज़रती रात के साथ
और स्याह होती
इकट्ठी नींदों की रोशनाई में
अतीत की कलम डुबोकर
ज़िन्दगी की स्लेट पर
उसने
लिखनी चाही इक कविता.

लेकिन स्याही में घुली
टीसों की कसक
कलम में अटकी एक पुकार
और
स्लेट के सतही मौन
के द्वंद से
जो उभरा अन्ततः
वो था एक दु :स्वप्न सरीखा.

स्वप्न देखने की आदि 
उन आँखों का धैर्य 
बह निकला पूरे वेग से 

इक बूँद समंदर की सुनामी
बहा ले गयी बहुत कुछ
अपने प्रवाह में
और
जो बचा
वो था
वर्तमान का
एक यतीम खण्डहर.

इक भग्नावशेष -
-अनाथ-
जिसका कोई इतिहास न था
और
इतना स्याह
जिस पर
किसी भविष्य, ईश्वर, प्रेम
या
कविता
के हस्ताक्षर की गुंजाईश न थी.

'मै जिधर खड़ा हु, उधर रात का मुहाना है.'


शनिवार, 25 मई 2013

खण्डहर- भाग १

इतिहास ना तो विजेताओं के झूठ का पुलिंदा है ना पराजितो के भ्रमो का आख्यान. इतिहास उन जीते चले जा रहे लोगो का संस्मरण है, जिनमे से अधिकतर न तो विजेता है न ही पराजित |
                     
                                                             __________जूलियन बार्नेस, द सेंस ऑफ़ एन एंडिंग

                                                                                             @हौज़ ख़ास, नईं दिल्ली 

खण्डहर, स्मारक या भग्नावशेष गहरे - ह्रदय में कहीं - अचेतन या अर्धचेतन के स्तर पर, हमारे इक हिस्से का साकार रूप होते हैं. तभी तो उनसे एक नैसर्गिक जुड़ाव सा प्रतीत होता है - कुछ जान-पहचान जैसी, कुछ अपनेपन जैसा.

गहरे में- एक कोने में - हम सब एक खण्डहर (या ज्यादा) अपने साथ ढोते है- अपने इतिहास, अतीत, अपनी गरिमा, अपनी टीस, अपनी यादोँ, अपने दुख, अपने पछतावो, अपने एकांत से बना.

खण्डहर मृत होते हैं. पेड़ो के तने जैसे.

 ( वर्तमान की संरचनाओ पर जब भविष्य की रोशनी पड़ती है तो भूत में छाया की प्रतीति उभरती हैं. छाया की तरह खण्डहर के निर्माण के लिए भी अँधेरे और रोशनी के एक ख़ास तरह के अनुपात और समागम की आवश्यकता होती है. आत्मा के अँधेरे से स्याह कोई अन्धेरा संभव नही. भविष्य और आशाओं की रोशनी की चमक का जोड़ सृष्टि में मिलना दुर्लभ है. इस असंभव और दुर्लभ के बीच खण्डहर अपनी जगह खोज लेते है, सहेज लेते हैं).

खण्डहर नितांत निजी होते हैं. निजता से बाहर वो केवल मन बहलाव का, पर्यटन का, कौतुक का, बतकही का, स्थल बन सकते है. बस.
हर भग्नावशेष एक समय सभ्यता की, घर की, संभावना का साकार था. हर खण्डहर वर्तमान में जीवन पर मृत्यु के हस्ताक्षर का प्रतिनिधि हैं.

खण्डहर/भग्नावशेष शहर के बीचोबीच होकर भी शहर का, वर्तमान का, जीवन का, आपाधापी का, हिस्सा नहीं होता- हो ही नहीं पाता, हो ही नहीं सकता. अपनी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में भी खण्डहर की दीवारे इतनी सशक्त होती हैं कि शहर के प्रवेश को रोक सके.
हाँ सच में. तुमने सुना तो था शहर को बाहर छूटते.

जीवन में मृत्यु की गहन इच्छा निहित हैं. इतिहास उसी नश्वरता का बयान है और मृत्यु की अमरता का आख्यान भी. संतुलन इतिहास के सारतत्वो में से एक हैं.

इतिहास -निरंतरता और स्थायित्व के दो ध्रुवो, चेतना और जड़ता के  के बीच, सधा हुआ मध्य बिंदु है. मानो त्रिकोण के तीसरे कोण वाला मध्य, बुद्ध के मध्यम मार्ग वाला मध्य. भूत की जड़ता और भविष्य की संभावना के बीच की निरंतरता.

खण्डहर इतिहास के इसी संतुलन में कही अपनी उपयोगिता - अपना स्थान - अपना होना खोज लेते हैं. इतिहास खंडहरों को सहेजने - उनकी कहानी फिर से कहने, उनका दुःख समझने, उनकी टीस और दर्द सुनने की कला का उपक्रम है. इतिहास का भग्नावशेषो में जाने का उपक्रम गहन अर्थो में मानवीय है. और कैथार्टिक भी.

मुझे इतिहास से और उसकी इसी मानवीयता से प्रेम है.



खण्डहर इतिहास की पूँजी हैं. हम सबके खण्डहर.


शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

पीपल का पेड़ और इक खाली बेंच..


एक पुराने से पीपल के पेड़ के नीचे बिछी हुयी बेंच की ओर जाता हूँ बैठने और पाता हूँ कि पेड़ के कुछ टूटे पत्ते वहाँ आकर पहले से ही बैठे हुए थे. वैसे भी इस तरह की बेंचो पर बैठना टूटे पत्तो को कुछ ज्यादा ही पसंद हैं. शायद.

अपने बैठने के लिए मै पत्तो को सादर करता हु किनारे और देखता हूँ कि उन पीले पत्तो की भीड़ में कुछ हरे पत्ते भी हैं. वैसे पेड़ से टूट चुके हरे पत्ते और आस - पास बिखरे पीले पत्तो में कोई फर्क होता हैं क्या?

होना तो चाहिए.
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मै जब अकेले किसी बेंच पर बैठने जाता हूँ मुझे याद आ जाता है बचपन - अपना स्कूल, पापा का आफिस, उसमे बहुत सारे मोर. और बाबा.
गाँव से सैकड़ो मील दूर उस छोटे से शहर में बाबा जब भी कुछ महीनो के लिए आते तो हर शाम स्टेशन घूमने जाने का सिलसिला शुरू हो जाता. जाते हुए कुल्फी खाना और आते हुए कोक की जिद करना उन घंटो की दिनचर्या थी. स्टेशन घूमना क्या होता था - बस जाकर एक बेंच पर बैठ जाते थे. वो खैनी बनाते और मै दूर हट जाता क्योकि नहीं तो उसकी ठसक नाक में लगती और फिर मै छींकता रहता.
(कभी कभी सिगरेट के किसी कश या धुएं से वो ठसक अचानक से उठती है आज भी).
एक बार बेंच पर बैठे तो समय मानो ठहर जाता था. छोटे से स्टेशन से गुज़रती कुछ ट्रेन, मालगाड़ीयाँ, और इक्का दुक्का मुसाफिर. उस समय बेंच पर गिरने वाले पीले पत्ते मुझे याद नहीं. मुझे याद है बेंच पर बैठे बाबा.
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मेरे लिए स्टेशन संसार से उतने ही बाहर है जितना विश्वामित्र के लिए काशी थी.
(सारी दुनिया दान देने के बाद भी विश्वामित्र का बचा हुआ क़र्ज़ उतारने के लिए हरिश्चंद्र को काशी के एक मरघट में काम करना पड़ा. काशी में - क्योकि बाकी की दुनिया तो दान कर चुके थे).
अपनी दुनिया से मुझे जब भी बाहर निकलने का मन होता है, मै स्टेशन जाता हूँ. किसी एक शहर में होते हुए भी स्टेशन किसी एक शहर का नही होता.
स्टेशन तो शहर से बाहर जाने का द्वार होता है. (वैसे बाहर जाने का द्वार ही अन्दर आने का रास्ता भी सुझाता है!)
और स्टेशन से आने - जाने वालो की भीड़ के बीच कही न कही एक खाली बेंच इंतज़ार कर रही होती है.

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वैसे जिस पीपल के नीचे बुद्ध बैठते थे - वहां भी ज़रूर कोई बेंच रही होगी.
बुद्ध, बेंच और पीपल से मेरा प्रेम पुराना है.
जीवन प्रेम की खोज है. प्यास है. और एक सफल जीवन - प्रेम की श्रंखला.
हर प्रेम पिछले प्रेम की कीमत पर नही होता बल्कि उसे संजो के होता है.

'ज़िन्दगी मुझ को तेरा पता चाहिये'









गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

अनिद्रा उवाच

जानते हो अगर दिन अधूरा रह जाए तो नींद नहीं आती. या आती भी है तो इतनी सतही कि उठकर ऐसा लगे मानो एक छोटे अंतराल का बुरा सा स्वप्न देखा हो----
( क्या दिन अधूरा रह जाने पर ही ऐसा होता है ?/ और ये भी तो बताओ  की दिन पूरा हो जाने का पैमाना क्या होता है? )
 ----- क्योकि दिन की ताकते-जो सदा से जीवन की ताकतों के साथ रही हैं- रात के अँधेरे का अतिक्रमण कर जाती है..
.. रात की शान्ति, उसके भोलेपन और सबको अपना लेने की कोशिश या आदत ने उसे कई तत्वों के संघर्ष का मैदान बना दिया है.
जहा चाँद, तारे, और नक्षत्र दिन के हस्तक्षेप का प्रतिनिधित्व करते है और सूरज की उजली छवि के बल पर चमकते रहते है, वही शहर का अवसाद, चुप्पी और सन्नाटा भी रात की नैसर्गिक शान्ति और एकांत की आड़ में  वातावरण पर काबिज हो जाते है.

शहरों में नींद और रात को खोजना मुश्किल और उनका मेल कराना और भी दुष्कर होता जा रहा है.

सोने की सजग कोशिशे बदस्तूर जारी है.

शहर फ़ैल रहा है. सजग रहना.
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आज रात नींद नहीं आएगी वो जानता था. गहरी नींद सोये हुए ज़माना सा बीता लगता है. एक शोर है जो सोने नहीं देता या शायद स्वयं के निर्मित एकाकीपन से उपजा इतना सन्नाटा और सुनसान आसपास पसर गया है कि उसे सोने की जगह नहीं मिलती.

(किसी रोज़, आकर सब जगह पर लगा दो. सोने की थोड़ी सी जगह बना दो.)

"जगह खाली है, एक ईश्वर चाहिए !"







गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

पेड़. शहर. डायरी....


एक वृक्ष जैसे जैसे बड़ा होता जाता है - जैसे जैसे वह फल देने लायक होने लगता है - जैसे जैसे वह मज़बूत होने लगता है - उसी समय उसका एक हिस्सा मृत हो रहा होता है. उस मृत हिस्से की बनावट, मजबूती, आकार ही बाज़ार में उस वृक्ष की कीमत तय करती है.  वह मृत, कठोर, जीवनहीन हिस्सा उसको फलो का बोझ और तूफानों के थपेड़े सहने की ताकत देता है . वही मृत हिस्सा वृहत्तर अर्थो में जीवन का आधार बन जाता है.

इस प्रकार मृत्यु अनिवार्यतः जीवन का विरोधी विलोम नहीं होती. जीवन की संभावनाए कई बार मृत्यु की गोद में ही जन्म लेती और फलती-फूलती है.

वैसे मृत्यु व्यवहारिकता का इक पर्याय है और खालिस जीवन निरा यूटोपिया.

विशाल वृक्ष जीवन और मृत्यु के सहस्तित्व का...तालमेल का.. अप्रतिम और सुलभ उदाहरण है.
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हर वृक्ष का अपना एकांत होता है. एक एकांत जिसके निर्माण करने की कला और रक्षा करने का सामर्थ्य हर वृक्ष की  जैविक संरचना में पहले से होता है. विशाल वन में भी - जिसमे हज़ारो की संख्या में वृक्ष होते है - हर वृक्ष अपना एकांत खोज लेता ...या शायाद निर्मित कर लेता है. हर पंछी जो उसकी डाल पर बैठता है...हर मुसाफिर जो उसकी छाह में सुस्ताता है...उस एकांत को महसूस करता है. हर हवा का झोंका जो वृक्ष को छूता है और हर फुहार जो उसको सराबोर कर देती है ... उस एकांत को जानते है..उसका सम्मान करते है.


वृक्ष का एकांत उसकी सबसे अनमोल निधि है.

जब तक वृक्ष है एकांत की संभावना जीवित है.

शहरों का फैलना और वृक्षों का कटना जारी है.

वृक्ष एकांत का पर्याय है... शहर अकेलेपन की सर्वोच्च संभावना.
(अकेलापन और एकांत पर्यायवाची नहीं होते)
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 मै कई बार खड़े होकर दुनिया के इक बड़े से नक़्शे के बायीं ओर टंगे हुए छोटे से शीशे में एक बड़े हो रहे वृक्ष को निहारता हूँ. उसके मृत हो रहे हिस्से को देखता हूँ..धड़क रहे हिस्से की कोशिश को सुनता हूँ. जीवन की संभावनाओ को देख पुलकित भी होता हूँ.
लेकिन कुछ आवाज़े आ रही है.. फ़ोन बज रहा है.. मेल, ट्विटर, और फेसबुक नोटिफिकेशंस है. प्रतियोगी परिक्षाए है. बहुत साड़ी अपेक्षाए है.. आशाये है. कुछ तुम हो. कुछ मै हूँ. इक बड़ा शून्य है. कुछ यादो का कोलाज है, कुछ सपनो की टीस है...कुछ इच्छाओ की धुंध.

नज़दीक से जाना. शहर फ़ैल रहा है. सच में.

'नामहीन समुन्द्र के ना जाने/किस तट पर /तुम कहाँ हों ?/मै यातायात से भरे पथ पर/ 
अकेला बैठा हूँ यहाँ'











शनिवार, 23 मार्च 2013

डायरी... आखिरी पन्ना.

मिट्टी,
और
पानी, और
थोडा सा लाल रंग
का घोल बना कर
डाल गया था कोई आसमान पर.


वो
अपने कदमो के निशान
छोड़ गया था
उस सड़क पर
जो
इक ऊँची-नीची रेखा की तरह
क्षितिज को क्षितिज
से जोड़ती प्रतीत होती थी


इस पर चलने वाले
वो दोनों
शाश्वत प्रेमी थे.
क्षितिज से निकले थे
अनंत की यात्रा पे .


उस यात्रा में कई पड़ाव रहे -
विश्राम के लिए.
प्रेम के लिये.
गंगा,
अमृत,
और
विष भी बहा.
वो गंगारोहण और अमृतमंथन
के संगम का प्रतीक थे.


यात्रा अधूरी रही -
हर यात्रा की तरह.
वो यात्री
प्रेमी रहेंगे
सहयात्री नहीं.

यात्रा का एक मूल्य होता है
जो यात्री बिछुड़ कर चुकाते है.


....'अब मै आकाश को पुकारना चाहता हूँ'

शनिवार, 16 मार्च 2013

कुछ .. डायरी से ..


नदियाँ  समंदर की तिश्नगी को तृप्त करने की कोशिश करती हैं या धरती के उस हिस्से की प्यास को जिसे समंदर भी नहीं बुझा पाया ?
कोई नहीं जानता.
नदी प्रश्न और उत्तर की ज़बान नही बोलती. वो केवल आमंत्रण की भाषा जानती है.
पानी का आमंत्रण अमर होता है. आमंत्रित के स्वीकार/अस्वीकार से स्वतंत्र. स्वायत्त, शाश्वत और अमर.
प्रेम पानी सा होता है. समुन्द्र के पानी सा. पानी जिसमे उतर आता है नीला आसमान. और जिसमे समाता सा लगता है क्षितिज.
वैसे हमारा क्षितिज किसी और का आसमान होता है.
क्षितिज सौंदर्य की सबसे मुखर उपस्तिथियो और सटीक अभिव्यक्तियों  में से एक है (- कविता, चाँद,  मुस्कान और मटर के दाने के जैसे ).
सौंदर्य अनैतिक होने के लिए अभिशप्त है.
नैतिक समाज में सौंदर्य अप्राप्त्य रहेगा.
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मैंने कभी कुछ नहीं रचा. या जो रचा वो इतना मूल्यहीन है की उसे डिसओन करना चाहता हूँ. हाँ - थोडा कुछ है जो समेटा है या समेटने की कोशिश की है. वही मूल्यवान है. यह कुछ ख़ुशी भी देता है और इक टीस भी - टीस - कि कितना कुछ था जो समेट न सका... सहेज ना पाया - खो दिया. शायद हमेशा के लिए.

इस टीस और इतिहास से मेरे प्रेम में कुछ गहरा सम्बन्ध है.

बुधवार, 23 जनवरी 2013

वो. जीवन.

                १ 
दिन भर द्वार खटकाने के बाद
चली गयी थी धूप
छोड़ कर के कुछ रंग
थोड़ी सी गर्माहट
और बहुत सारा भारीपन

आँखों को चुभा घना  अन्धेरा
जो हर बीतते पल के साथ हो रहा था और सघन,
और आरामदेह,

और खतरनाक

उसने डिब्बे में बंद की कुछ आवाज़े
एक काग़ज़ में लपेटी थोड़ी सी खुशबु
जेब में डाल ली एक धुन
चेहरे पे मली थोड़ी सी चांदनी

और निकल पड़ा वो घर से,
रास्ते चलते रहे
पैरो के नीचे से 
और वो गुज़रता गया 
जैसे गुज़र जाती है सदिया 
होते हुए मिथकों से 
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                २ 
उसके निकलने के बाद
कमरे में गयी थी वो
बटोरने कुछ यादे
समेटने कुछ टुकड़े
(जिन्हें इतिहास अपने साथ ले जाना भूल जाता है अक्सर
एक गैरजिम्मेदाराना जल्दीबाजी में) 

कमरा-जिसमे छूट गयी थी- थोड़ी सी खुशबु, एक मुस्कान 
और थोड़ा सा अकेलापन
फर्श पर बिखरी थी
थोड़ी सी चांदनी
और बहुत सारी धूल
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                ३ 
उस घर ने देखा था पथिक को
समझा था उसकी यात्रा को 
और सहा था लंबा इंतज़ार भी 

घर बेबस था,
असफल था, 
सुरक्षित था

घर तटस्थ था. 


क्योकि कुछ जगहों पर रह जाता है हमारा कुछ हिस्सा ..
समय, इतिहास और कारणों से परे.. कुछ निजी.