मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

जेब में हाथ डालकर चलने वाले कवि की कविता

मै तुम्हे याद करते हुए ही जाता हूँ
और कहीं नही पहुंचता
मै डरते-डरते जाता हूँ
और कहीं नही पहुंचता

डर छूने से फैलता है
मै इसे फैलने से रोकने की असफल कोशिश करते हुए ही जाऊंगा
कही भी न पहुँचने के लिए.

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

मै काट दी गयी कविता में भी
अक्सर वर्तनियो की अशुद्धियाँ ठीक करता पाया जाता हूँ.

ये इतिहास को छूने से लगा रोग है
जो मेरे जीवन से होता हुआ 
कविताओं में भी फैल गया है.

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

मेरे पास छूने की केवल स्मृति रही
छूने का यथार्थ मैंने स्मृति से पाया
छूने की कल्पना सदा से स्मृति में ही थी.

छूने के उस कम्पन में ही जाना मैंने प्रेम
छूने के स्वाद में ही चखा मैंने विलगाव.

मै कहना चाहता था कि छूने से आ जाता है विश्वास 
कि छूने से बंधता है ढाढस
कि छूने से बढ़ता है प्रेम 
मै लिखता जाता हूँ कि मुझे छूने से अब लगता है भय
कि छूने से टूट जाते है स्वप्न
कि छूने से फैलती है महामारियाँ


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें