रविवार, 27 अक्तूबर 2013

कवि : नींद, सपने और कविता




पलट कर मत देखना कभी 
कहता है कवि 
सपनो को 
विदा करने से पहले 
पुरखो की रह पर 
गंगा की धार मे 

इसके बाद कवि को 
फिर कभी नहीं आते सपने 
उसको आती है अब केवल नींद 
एक लम्बे-निष्प्रयोजन जागरण के बाद 

उसका पूरा जीवन अब एक इंतज़ार है 
-जागरण में निद्रा का 
-निद्रा में सपनो का 
-सपनो को एक पुकार का 

हर इंतज़ार को समेटे एक मौन हैं 
जिसमे लिखी जाती हैं कवितायें 
जिन्हें कभी नहीं पढ़ा जाता 
-नहीं पढ़ा जा सकता 
सभ्य समाज मे 


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