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बुधवार, 19 जून 2013

कुछ खोया, कुछ गुम हो गया.

माँ को व्यवस्थित चीज़े पसंद है. अभी शाम को बाहर चहलकदमी के लिए गया और वापस आया तो पाया की निर्मल वर्मा का उपन्यास कमरे के दूसरे कोने में किताबो की रेक में रखा जा चुका है. उसका बुक-मार्क कलम वाले  डिब्बे में सलीके से खोस दिया गया है. एक रजिस्टर जिसे मै खुला छोड़कर गया था उसे बंद करके सामने मेज पर ही दीवार के सहारे खड़ा कर दिया गया है. संक्षेप में - सब कुछ व्यवस्थित सा हो गया है.

लेकिन मेरी कलम जिससे मै लिख रहा था - एक बड़ी साधारण सी कलम थी कि बस लिखकर ख़त्म कर भूल जाऊंगा- कहीं दिख नहीं रही. वहीँ, खुली हुई रजिस्टर पर ही रखी थी और उसकी रोशनाई कुछ बैंगनी सी थी. उससे लिख कर अचानक अपनी लिखावट के प्रति प्रेम उपज रहा था. (मेरे जैसे आत्ममुग्ध व्यक्ति के लिए भी अपनी लिखावट से प्रेम विरल है. लिखावट के प्रति इस विरल प्रेम का एक कारण मेरे शिक्षक है जिन्होंने ना जाने कितनी मरतबा मेरी लिखावट को लेकर मेरा सार्वजनिक अभिनन्दन किया है और इंक पेन से ले कर जैल पेन तक के इस्तेमाल में मेरा एक समान कबीरपंथी भाव देख कर अपने बाल नोचे हैं. गालो पर पड़ने वाली हथेलियों की छाप और हथेलियों पर छड़ी के निशाँ सरीखी यादो को मैंने अपने बड़प्पन में भुला दिया है.)  बहरहाल अब तक उस कलम का केवल ढक्कन दिखा है. कोने में वो भी बड़े व्यवस्थित ढंग से रखा है. जाने क्यों ढक्कन के बिना पेन अधूरा सा हो जाता है. लगता है अब ख़त्म हो गया है. जाने कितनी ही बार ऐसा हुआ है की कई बिना ढक्कन वाले पेन के रखे होने के बाद भी कोई कलम ना होने का आभास और नयी कलम लाने की ज़रुरत महसूस हुयी है. ये अधूरेपन की त्रासदी है. जीवन की भी.

अब जब ढक्कन ही दिख रहा है तो लगता है कलम गुम हो चुकी है. गुम- ये शब्द बहुत पुराना है मेरी स्मृति में. इसका पहला परिचय मेरे पहले स्कूल, मेरे पहले लंच बॉक्स और पानी की बोतल और मेरे बचपन की दोस्ती की पहली स्मृति से जुड़ा है. (कितनी ही यादें चुपचाप अस्तित्व के एक कोने में बनी रहती है. अपनी उम्र जीते हुए. कुछ स्मृतियाँ- ख़ास तौर पर पहली बार की यादें तो ताउम्र एक-सी रहती है. पहला स्कूल, पहले दोस्त, पहला प्रेम. सजीव. स्पष्ट.). उस छोटे से शहर की मेरी गली के दुसरे छोर ही मेरा पहला स्कूल था. मेरा पहला स्कूल. वहां पर बने मेरे पहले दोस्त परवीन (नाम शायद प्रवीन रहा हो पर मुझे परवीन ही याद हैं) की बोली मुझसे कुछ अलग थी.  (उस छोटे से शहर की एक गली में इतने तरह के लोग रहते थे और यहाँ  कल न्यूज़ चैनल पर आ रही एक बहस में एक तथाकथित राष्ट्र कवि 'एक भाषा एक संस्कृति' को एक राष्ट्र का पर्याय बता रहे थे. जबकि उनके राष्ट्र की परिभाषा में उस छोटे से  शहर की एक गली भी नहीं समाती). अपनी बोली में उसने मेरी पानी की बोतल के खो जाने को गुम हो जाना कहा था. बचपन की थोड़ी सी तुतलाहट और दोस्त की मम्मी से दोस्त की शिकायत करने के उल्लास से उपजे स्पेशल इफेक्ट्स के साथ. ये शब्द उसी तरह ज़ेहन में रह गया. बड़े होने की प्रक्रिया में उसके खो जाने - या गुम हो जाने के बाद भी. हाँ, गुम हो जाने के बाद भी.

पता नही क्यों लगता है खो जाने और गुम हो जाने के लिए मन ने अलग अलग खांचे बना लिए हैं. खो जाने में खोने वाले को अपनी कुछ भूल सी महसूस होती है, और ये एहसास भी की जो खो गया है अब वो मिलेगा नहीं. और वह भी एक अजीब सी बेबस स्वीकार के साथ कि जो खोया है वो भूगोल या काल के किस हिस्से में है ये मालूम है. और जिसे हाथ बढ़ाकर जब चाहे छु सकते है. कर सकने और सचमुच करने की बीच की दूरी मे खो देने के संत्रास का मर्म छिपा है.

गुम हो जाने मे एक स्वतन्त्रता की झलक हैं. गुम हो जाने वाले की, गुम कर देने वाले की और समय की. और आशा-निराशा का- चोर पुलिस वाला, इश्वर शैतान वाला खेल भी नही हैं. कोई इंतज़ार नही. कोई ग्लानी नही.

बहरहाल कलम को लेकर यही भावना है - कि कलम गुम हो चुकी है. या परवीन की तरह कहूँ तो कलम गुम गयी है. बहुत कुछ गुम जाता है व्यवस्था के स्थापन मे, बड़े होने की प्रक्रिया मे.
और बहुत कुछ हम खो देते है.


मैंने रजिस्टर फिर खोल ली है. लेकिन ये वो नही है जो मैंने बंद की थी. छोड़ कर जाने और फिर लौट कर आने के बीच बहुत कुछ बदल जाता है. कभी कभी सब कुछ.  इसके झक-सफ़ेद से अध्-लिखे पन्ने पर रखी कलम के अलावा कई अनलिखे शब्द, सही विन्यास की राह तकते वाक्य और ठहरने के लिए बमुश्किल तैयार हुए कई आवारा खानाबदोश ख़याल गायब हैं. शायद ढुलक कर नीचे गिर गए होंगे जब माँ ने रजिस्टर बंद किया होगा और बुहार ले गया होगा उनको कोई मध्यवर्गीय घरो में कूड़े में पायी जाने वाली कुछ महीन धूल और  कुछ-एक काग़ज़ के टुकड़ो के साथ.

'मै उतना ही थमा हूँ, जैसे कोई प्रार्थना हूँ' ~ गीत चतुर्वेदी 

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

पीपल का पेड़ और इक खाली बेंच..


एक पुराने से पीपल के पेड़ के नीचे बिछी हुयी बेंच की ओर जाता हूँ बैठने और पाता हूँ कि पेड़ के कुछ टूटे पत्ते वहाँ आकर पहले से ही बैठे हुए थे. वैसे भी इस तरह की बेंचो पर बैठना टूटे पत्तो को कुछ ज्यादा ही पसंद हैं. शायद.

अपने बैठने के लिए मै पत्तो को सादर करता हु किनारे और देखता हूँ कि उन पीले पत्तो की भीड़ में कुछ हरे पत्ते भी हैं. वैसे पेड़ से टूट चुके हरे पत्ते और आस - पास बिखरे पीले पत्तो में कोई फर्क होता हैं क्या?

होना तो चाहिए.
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मै जब अकेले किसी बेंच पर बैठने जाता हूँ मुझे याद आ जाता है बचपन - अपना स्कूल, पापा का आफिस, उसमे बहुत सारे मोर. और बाबा.
गाँव से सैकड़ो मील दूर उस छोटे से शहर में बाबा जब भी कुछ महीनो के लिए आते तो हर शाम स्टेशन घूमने जाने का सिलसिला शुरू हो जाता. जाते हुए कुल्फी खाना और आते हुए कोक की जिद करना उन घंटो की दिनचर्या थी. स्टेशन घूमना क्या होता था - बस जाकर एक बेंच पर बैठ जाते थे. वो खैनी बनाते और मै दूर हट जाता क्योकि नहीं तो उसकी ठसक नाक में लगती और फिर मै छींकता रहता.
(कभी कभी सिगरेट के किसी कश या धुएं से वो ठसक अचानक से उठती है आज भी).
एक बार बेंच पर बैठे तो समय मानो ठहर जाता था. छोटे से स्टेशन से गुज़रती कुछ ट्रेन, मालगाड़ीयाँ, और इक्का दुक्का मुसाफिर. उस समय बेंच पर गिरने वाले पीले पत्ते मुझे याद नहीं. मुझे याद है बेंच पर बैठे बाबा.
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मेरे लिए स्टेशन संसार से उतने ही बाहर है जितना विश्वामित्र के लिए काशी थी.
(सारी दुनिया दान देने के बाद भी विश्वामित्र का बचा हुआ क़र्ज़ उतारने के लिए हरिश्चंद्र को काशी के एक मरघट में काम करना पड़ा. काशी में - क्योकि बाकी की दुनिया तो दान कर चुके थे).
अपनी दुनिया से मुझे जब भी बाहर निकलने का मन होता है, मै स्टेशन जाता हूँ. किसी एक शहर में होते हुए भी स्टेशन किसी एक शहर का नही होता.
स्टेशन तो शहर से बाहर जाने का द्वार होता है. (वैसे बाहर जाने का द्वार ही अन्दर आने का रास्ता भी सुझाता है!)
और स्टेशन से आने - जाने वालो की भीड़ के बीच कही न कही एक खाली बेंच इंतज़ार कर रही होती है.

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वैसे जिस पीपल के नीचे बुद्ध बैठते थे - वहां भी ज़रूर कोई बेंच रही होगी.
बुद्ध, बेंच और पीपल से मेरा प्रेम पुराना है.
जीवन प्रेम की खोज है. प्यास है. और एक सफल जीवन - प्रेम की श्रंखला.
हर प्रेम पिछले प्रेम की कीमत पर नही होता बल्कि उसे संजो के होता है.

'ज़िन्दगी मुझ को तेरा पता चाहिये'









गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

अनिद्रा उवाच

जानते हो अगर दिन अधूरा रह जाए तो नींद नहीं आती. या आती भी है तो इतनी सतही कि उठकर ऐसा लगे मानो एक छोटे अंतराल का बुरा सा स्वप्न देखा हो----
( क्या दिन अधूरा रह जाने पर ही ऐसा होता है ?/ और ये भी तो बताओ  की दिन पूरा हो जाने का पैमाना क्या होता है? )
 ----- क्योकि दिन की ताकते-जो सदा से जीवन की ताकतों के साथ रही हैं- रात के अँधेरे का अतिक्रमण कर जाती है..
.. रात की शान्ति, उसके भोलेपन और सबको अपना लेने की कोशिश या आदत ने उसे कई तत्वों के संघर्ष का मैदान बना दिया है.
जहा चाँद, तारे, और नक्षत्र दिन के हस्तक्षेप का प्रतिनिधित्व करते है और सूरज की उजली छवि के बल पर चमकते रहते है, वही शहर का अवसाद, चुप्पी और सन्नाटा भी रात की नैसर्गिक शान्ति और एकांत की आड़ में  वातावरण पर काबिज हो जाते है.

शहरों में नींद और रात को खोजना मुश्किल और उनका मेल कराना और भी दुष्कर होता जा रहा है.

सोने की सजग कोशिशे बदस्तूर जारी है.

शहर फ़ैल रहा है. सजग रहना.
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आज रात नींद नहीं आएगी वो जानता था. गहरी नींद सोये हुए ज़माना सा बीता लगता है. एक शोर है जो सोने नहीं देता या शायद स्वयं के निर्मित एकाकीपन से उपजा इतना सन्नाटा और सुनसान आसपास पसर गया है कि उसे सोने की जगह नहीं मिलती.

(किसी रोज़, आकर सब जगह पर लगा दो. सोने की थोड़ी सी जगह बना दो.)

"जगह खाली है, एक ईश्वर चाहिए !"







शनिवार, 23 मार्च 2013

डायरी... आखिरी पन्ना.

मिट्टी,
और
पानी, और
थोडा सा लाल रंग
का घोल बना कर
डाल गया था कोई आसमान पर.


वो
अपने कदमो के निशान
छोड़ गया था
उस सड़क पर
जो
इक ऊँची-नीची रेखा की तरह
क्षितिज को क्षितिज
से जोड़ती प्रतीत होती थी


इस पर चलने वाले
वो दोनों
शाश्वत प्रेमी थे.
क्षितिज से निकले थे
अनंत की यात्रा पे .


उस यात्रा में कई पड़ाव रहे -
विश्राम के लिए.
प्रेम के लिये.
गंगा,
अमृत,
और
विष भी बहा.
वो गंगारोहण और अमृतमंथन
के संगम का प्रतीक थे.


यात्रा अधूरी रही -
हर यात्रा की तरह.
वो यात्री
प्रेमी रहेंगे
सहयात्री नहीं.

यात्रा का एक मूल्य होता है
जो यात्री बिछुड़ कर चुकाते है.


....'अब मै आकाश को पुकारना चाहता हूँ'

बुधवार, 23 जनवरी 2013

वो. जीवन.

                १ 
दिन भर द्वार खटकाने के बाद
चली गयी थी धूप
छोड़ कर के कुछ रंग
थोड़ी सी गर्माहट
और बहुत सारा भारीपन

आँखों को चुभा घना  अन्धेरा
जो हर बीतते पल के साथ हो रहा था और सघन,
और आरामदेह,

और खतरनाक

उसने डिब्बे में बंद की कुछ आवाज़े
एक काग़ज़ में लपेटी थोड़ी सी खुशबु
जेब में डाल ली एक धुन
चेहरे पे मली थोड़ी सी चांदनी

और निकल पड़ा वो घर से,
रास्ते चलते रहे
पैरो के नीचे से 
और वो गुज़रता गया 
जैसे गुज़र जाती है सदिया 
होते हुए मिथकों से 
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                २ 
उसके निकलने के बाद
कमरे में गयी थी वो
बटोरने कुछ यादे
समेटने कुछ टुकड़े
(जिन्हें इतिहास अपने साथ ले जाना भूल जाता है अक्सर
एक गैरजिम्मेदाराना जल्दीबाजी में) 

कमरा-जिसमे छूट गयी थी- थोड़ी सी खुशबु, एक मुस्कान 
और थोड़ा सा अकेलापन
फर्श पर बिखरी थी
थोड़ी सी चांदनी
और बहुत सारी धूल
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                ३ 
उस घर ने देखा था पथिक को
समझा था उसकी यात्रा को 
और सहा था लंबा इंतज़ार भी 

घर बेबस था,
असफल था, 
सुरक्षित था

घर तटस्थ था. 


क्योकि कुछ जगहों पर रह जाता है हमारा कुछ हिस्सा ..
समय, इतिहास और कारणों से परे.. कुछ निजी.