प्रेम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
प्रेम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 10 नवंबर 2019

मैं टुकड़े-टुकड़े समझ जोड़ रहा हूँ - 1











हिम्मत टुकड़े टुकड़े जोड़ कर बनती है
टूटतीं भी हिस्सो में है

मैं टूटता हूँ, भूलता हूँ
बनता हूँ, याद करता हूँ

एक पंक्ति लिखकर मै हिसाब दोहराना चाहता हूँ
एक पंक्ति लिखकर मै सब सुलझाना चाहता हूँ

एक लम्बे समय से अपनी हर कविता में
मै लिख रहा हूँ एक ही पंक्ति बार-बार

मेरा हर शब्द इतना छोटा है
कि काग़ज़ पर कविता नही
एक लकीर नज़र आती है

मैं कविता लिखता 
और लकीरो से ढकने लगता जीवन का यथार्थ 
कभी मिटाता कोई लकीर
तो जीवन से विदा ले लेती कोई पुरानी कविता

गले में अटकते
दुःस्वप्नों में भटकते
बेमतलब -
घिस चुके शब्द
एक-एक कर छोड़ रहा हूँ

मैं टुकड़े-टुकड़े समझ जोड़ रहा हूँ











बुधवार, 17 अप्रैल 2019

बेस्ट ऑफ थ्री



Street Still Life, Martin Vorel













जो याद है उसे भूलना मुश्किल है
जो भूल रहा है उसे बनाये रखना उससे भी कठिन
लिखे हुए को मिटाने और काटे हुए को पढ़ने में बहुत वक़्त ज़ाया होता है
ये सोचकर सारे कवि रोटी कमाने चले गए.

हमारे वक़्त में न रोटी की कमी है न शब्दो की
फिर भी भूख से मर जाते है लोग
और जीवन से गायब रहती कविता.

किसी रानी का स्वर कहीं पार्श्व से गूंजता
ये भूखे लोग रोटी की जगह शब्द क्यो नही खा लेते

कोई क्रांतिकारी भूख मिटा देने वाली
गिलोटिन देख कर मुस्कुरा रहा है.

अपनी दुनिया को मैं हर बार एक विस्मय के साथ देखता हूँ
इतिहास देखता है वापस मुझे
मेरी ही नज़रों से

प्रेम से बिंधे एक युगल की तरह
हम दोनों ही निराश भी होते है अक्सर एक दुसरे से

हम हताश होते है उस दोहराव से
जो पहली बार त्रासदी और फिर उसके बाद
हर बार एक स्वांग लगा.

प्रेम
इतिहास,
कविता,
बेस्ट ऑफ थ्री में बच जाएंगे में हम शायद,
इस बचकानी उम्मीद की आंखों में मोतियाबिंद है.

प्रेम, इतिहास, कविता से
अगर तापें जाएंगे केवल अलाव
तो उम्मीदे गर्म भर रहेंगी
राख हो जाने तक.

समझ के साथ जीने के लिए हमे लपट नही
थोड़ी सी रोशमी चाहिए, बस.


सोमवार, 18 मार्च 2019

हाथ - 1

गुस्ताव क्लिम् की मशहूर पेंटिंग 












प्रेम को छिटक जाने देना
गैर-इरादतन हत्या करने जैसा है
जिसमे जुर्म वही रहता है
बस सज़ा कम मिलती है.

हर हथियार की धार को कभी गौर से देखना
वो इतनी पैनी होती है
कि नही होती उसपर किसी माफी
या पछतावे के एक क्षण जितनी
महीन-सी भी जगह

तमाम कातिल अपना जुर्म
पूरी तरह तभी समझ पाते है
जब एक रोज़
मूठ की जगह उनका सामना चाकू की धार से होता है.

हमारे हाथो की सबसे गहरी लकीरें
चाकू को उल्टा पकड़ने से बने निशान है.


मंगलवार, 5 मार्च 2019

दीवारें - 2

© एडवर्ड मंच, विकिमीडिया कॉमन्स 












मेरी स्मृति के पूरब में
एक प्रेम की दीवार है

उसपर लिखी है आधी कवितायें
और अधूरी कहानियाँ

हर कविता के दक्षिण में होता है
स्मृतियों का मरघट

अधूरी कहानियों के पात्र
प्रेत बनकर
अधूरी कविता के मरघट में घूमते हैं.

मैं प्रेम करता हूँ कि कहानी पूरी हो सके
ताकि वो प्रेत मुक्त हो जाएं.
प्रेम हर बार दगा कर जाता है
कहानी की बजाए कविता बन जाता है.

मुझे करने है अभी कई यत्न
जीने है अभी कई जीवन
सुननी और सुनानी है अभी कई कहानियाँ
देखने है अभी बहुत सारे स्वप्न

बस
मेरी उपस्थिति का सिरहाना हमेशा पूरब में रहे
कि ध्यान रखना कवि -
स्वप्न से भी प्रभावित होती है स्मृति
निद्रा स्वप्न-भंजक भी होती है.
और
दक्षिण में पैर करके नही सोते - ये मृत्यु की दिशा है.

                                             

सोमवार, 17 मार्च 2014

महानदी और प्रेम











लड़का करेगा लम्बी यात्राऐं
पार करता शहर,
नदियाँ, जंगल, पर्वत
मन के एक हिस्से से
ह्रदय के केंद्र की ओर.

लड़का लिखेगा छोटी कविताएँ
जिससे बाहर रहेंगे दुनिया भर के यथार्थ
और सहेजी जाएगी केवल
सत्य-असत्य, प्रेम-अप्रेम,
और 
स्वप्न की खोज.

एक महासमुन्द्र के किनारे
लड़का करेगा महानदी से प्रेम
स्मृति और स्वप्न के मुहाने पर
रचेगा नए यथार्थ

कुछ और खारा हो जाएगा समंदर
थोड़ी और मीठी हो जाएगी नदी.

बुधवार, 19 जून 2013

कुछ खोया, कुछ गुम हो गया.

माँ को व्यवस्थित चीज़े पसंद है. अभी शाम को बाहर चहलकदमी के लिए गया और वापस आया तो पाया की निर्मल वर्मा का उपन्यास कमरे के दूसरे कोने में किताबो की रेक में रखा जा चुका है. उसका बुक-मार्क कलम वाले  डिब्बे में सलीके से खोस दिया गया है. एक रजिस्टर जिसे मै खुला छोड़कर गया था उसे बंद करके सामने मेज पर ही दीवार के सहारे खड़ा कर दिया गया है. संक्षेप में - सब कुछ व्यवस्थित सा हो गया है.

लेकिन मेरी कलम जिससे मै लिख रहा था - एक बड़ी साधारण सी कलम थी कि बस लिखकर ख़त्म कर भूल जाऊंगा- कहीं दिख नहीं रही. वहीँ, खुली हुई रजिस्टर पर ही रखी थी और उसकी रोशनाई कुछ बैंगनी सी थी. उससे लिख कर अचानक अपनी लिखावट के प्रति प्रेम उपज रहा था. (मेरे जैसे आत्ममुग्ध व्यक्ति के लिए भी अपनी लिखावट से प्रेम विरल है. लिखावट के प्रति इस विरल प्रेम का एक कारण मेरे शिक्षक है जिन्होंने ना जाने कितनी मरतबा मेरी लिखावट को लेकर मेरा सार्वजनिक अभिनन्दन किया है और इंक पेन से ले कर जैल पेन तक के इस्तेमाल में मेरा एक समान कबीरपंथी भाव देख कर अपने बाल नोचे हैं. गालो पर पड़ने वाली हथेलियों की छाप और हथेलियों पर छड़ी के निशाँ सरीखी यादो को मैंने अपने बड़प्पन में भुला दिया है.)  बहरहाल अब तक उस कलम का केवल ढक्कन दिखा है. कोने में वो भी बड़े व्यवस्थित ढंग से रखा है. जाने क्यों ढक्कन के बिना पेन अधूरा सा हो जाता है. लगता है अब ख़त्म हो गया है. जाने कितनी ही बार ऐसा हुआ है की कई बिना ढक्कन वाले पेन के रखे होने के बाद भी कोई कलम ना होने का आभास और नयी कलम लाने की ज़रुरत महसूस हुयी है. ये अधूरेपन की त्रासदी है. जीवन की भी.

अब जब ढक्कन ही दिख रहा है तो लगता है कलम गुम हो चुकी है. गुम- ये शब्द बहुत पुराना है मेरी स्मृति में. इसका पहला परिचय मेरे पहले स्कूल, मेरे पहले लंच बॉक्स और पानी की बोतल और मेरे बचपन की दोस्ती की पहली स्मृति से जुड़ा है. (कितनी ही यादें चुपचाप अस्तित्व के एक कोने में बनी रहती है. अपनी उम्र जीते हुए. कुछ स्मृतियाँ- ख़ास तौर पर पहली बार की यादें तो ताउम्र एक-सी रहती है. पहला स्कूल, पहले दोस्त, पहला प्रेम. सजीव. स्पष्ट.). उस छोटे से शहर की मेरी गली के दुसरे छोर ही मेरा पहला स्कूल था. मेरा पहला स्कूल. वहां पर बने मेरे पहले दोस्त परवीन (नाम शायद प्रवीन रहा हो पर मुझे परवीन ही याद हैं) की बोली मुझसे कुछ अलग थी.  (उस छोटे से शहर की एक गली में इतने तरह के लोग रहते थे और यहाँ  कल न्यूज़ चैनल पर आ रही एक बहस में एक तथाकथित राष्ट्र कवि 'एक भाषा एक संस्कृति' को एक राष्ट्र का पर्याय बता रहे थे. जबकि उनके राष्ट्र की परिभाषा में उस छोटे से  शहर की एक गली भी नहीं समाती). अपनी बोली में उसने मेरी पानी की बोतल के खो जाने को गुम हो जाना कहा था. बचपन की थोड़ी सी तुतलाहट और दोस्त की मम्मी से दोस्त की शिकायत करने के उल्लास से उपजे स्पेशल इफेक्ट्स के साथ. ये शब्द उसी तरह ज़ेहन में रह गया. बड़े होने की प्रक्रिया में उसके खो जाने - या गुम हो जाने के बाद भी. हाँ, गुम हो जाने के बाद भी.

पता नही क्यों लगता है खो जाने और गुम हो जाने के लिए मन ने अलग अलग खांचे बना लिए हैं. खो जाने में खोने वाले को अपनी कुछ भूल सी महसूस होती है, और ये एहसास भी की जो खो गया है अब वो मिलेगा नहीं. और वह भी एक अजीब सी बेबस स्वीकार के साथ कि जो खोया है वो भूगोल या काल के किस हिस्से में है ये मालूम है. और जिसे हाथ बढ़ाकर जब चाहे छु सकते है. कर सकने और सचमुच करने की बीच की दूरी मे खो देने के संत्रास का मर्म छिपा है.

गुम हो जाने मे एक स्वतन्त्रता की झलक हैं. गुम हो जाने वाले की, गुम कर देने वाले की और समय की. और आशा-निराशा का- चोर पुलिस वाला, इश्वर शैतान वाला खेल भी नही हैं. कोई इंतज़ार नही. कोई ग्लानी नही.

बहरहाल कलम को लेकर यही भावना है - कि कलम गुम हो चुकी है. या परवीन की तरह कहूँ तो कलम गुम गयी है. बहुत कुछ गुम जाता है व्यवस्था के स्थापन मे, बड़े होने की प्रक्रिया मे.
और बहुत कुछ हम खो देते है.


मैंने रजिस्टर फिर खोल ली है. लेकिन ये वो नही है जो मैंने बंद की थी. छोड़ कर जाने और फिर लौट कर आने के बीच बहुत कुछ बदल जाता है. कभी कभी सब कुछ.  इसके झक-सफ़ेद से अध्-लिखे पन्ने पर रखी कलम के अलावा कई अनलिखे शब्द, सही विन्यास की राह तकते वाक्य और ठहरने के लिए बमुश्किल तैयार हुए कई आवारा खानाबदोश ख़याल गायब हैं. शायद ढुलक कर नीचे गिर गए होंगे जब माँ ने रजिस्टर बंद किया होगा और बुहार ले गया होगा उनको कोई मध्यवर्गीय घरो में कूड़े में पायी जाने वाली कुछ महीन धूल और  कुछ-एक काग़ज़ के टुकड़ो के साथ.

'मै उतना ही थमा हूँ, जैसे कोई प्रार्थना हूँ' ~ गीत चतुर्वेदी 

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

पीपल का पेड़ और इक खाली बेंच..


एक पुराने से पीपल के पेड़ के नीचे बिछी हुयी बेंच की ओर जाता हूँ बैठने और पाता हूँ कि पेड़ के कुछ टूटे पत्ते वहाँ आकर पहले से ही बैठे हुए थे. वैसे भी इस तरह की बेंचो पर बैठना टूटे पत्तो को कुछ ज्यादा ही पसंद हैं. शायद.

अपने बैठने के लिए मै पत्तो को सादर करता हु किनारे और देखता हूँ कि उन पीले पत्तो की भीड़ में कुछ हरे पत्ते भी हैं. वैसे पेड़ से टूट चुके हरे पत्ते और आस - पास बिखरे पीले पत्तो में कोई फर्क होता हैं क्या?

होना तो चाहिए.
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
मै जब अकेले किसी बेंच पर बैठने जाता हूँ मुझे याद आ जाता है बचपन - अपना स्कूल, पापा का आफिस, उसमे बहुत सारे मोर. और बाबा.
गाँव से सैकड़ो मील दूर उस छोटे से शहर में बाबा जब भी कुछ महीनो के लिए आते तो हर शाम स्टेशन घूमने जाने का सिलसिला शुरू हो जाता. जाते हुए कुल्फी खाना और आते हुए कोक की जिद करना उन घंटो की दिनचर्या थी. स्टेशन घूमना क्या होता था - बस जाकर एक बेंच पर बैठ जाते थे. वो खैनी बनाते और मै दूर हट जाता क्योकि नहीं तो उसकी ठसक नाक में लगती और फिर मै छींकता रहता.
(कभी कभी सिगरेट के किसी कश या धुएं से वो ठसक अचानक से उठती है आज भी).
एक बार बेंच पर बैठे तो समय मानो ठहर जाता था. छोटे से स्टेशन से गुज़रती कुछ ट्रेन, मालगाड़ीयाँ, और इक्का दुक्का मुसाफिर. उस समय बेंच पर गिरने वाले पीले पत्ते मुझे याद नहीं. मुझे याद है बेंच पर बैठे बाबा.
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

मेरे लिए स्टेशन संसार से उतने ही बाहर है जितना विश्वामित्र के लिए काशी थी.
(सारी दुनिया दान देने के बाद भी विश्वामित्र का बचा हुआ क़र्ज़ उतारने के लिए हरिश्चंद्र को काशी के एक मरघट में काम करना पड़ा. काशी में - क्योकि बाकी की दुनिया तो दान कर चुके थे).
अपनी दुनिया से मुझे जब भी बाहर निकलने का मन होता है, मै स्टेशन जाता हूँ. किसी एक शहर में होते हुए भी स्टेशन किसी एक शहर का नही होता.
स्टेशन तो शहर से बाहर जाने का द्वार होता है. (वैसे बाहर जाने का द्वार ही अन्दर आने का रास्ता भी सुझाता है!)
और स्टेशन से आने - जाने वालो की भीड़ के बीच कही न कही एक खाली बेंच इंतज़ार कर रही होती है.

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
वैसे जिस पीपल के नीचे बुद्ध बैठते थे - वहां भी ज़रूर कोई बेंच रही होगी.
बुद्ध, बेंच और पीपल से मेरा प्रेम पुराना है.
जीवन प्रेम की खोज है. प्यास है. और एक सफल जीवन - प्रेम की श्रंखला.
हर प्रेम पिछले प्रेम की कीमत पर नही होता बल्कि उसे संजो के होता है.

'ज़िन्दगी मुझ को तेरा पता चाहिये'









गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

पेड़. शहर. डायरी....


एक वृक्ष जैसे जैसे बड़ा होता जाता है - जैसे जैसे वह फल देने लायक होने लगता है - जैसे जैसे वह मज़बूत होने लगता है - उसी समय उसका एक हिस्सा मृत हो रहा होता है. उस मृत हिस्से की बनावट, मजबूती, आकार ही बाज़ार में उस वृक्ष की कीमत तय करती है.  वह मृत, कठोर, जीवनहीन हिस्सा उसको फलो का बोझ और तूफानों के थपेड़े सहने की ताकत देता है . वही मृत हिस्सा वृहत्तर अर्थो में जीवन का आधार बन जाता है.

इस प्रकार मृत्यु अनिवार्यतः जीवन का विरोधी विलोम नहीं होती. जीवन की संभावनाए कई बार मृत्यु की गोद में ही जन्म लेती और फलती-फूलती है.

वैसे मृत्यु व्यवहारिकता का इक पर्याय है और खालिस जीवन निरा यूटोपिया.

विशाल वृक्ष जीवन और मृत्यु के सहस्तित्व का...तालमेल का.. अप्रतिम और सुलभ उदाहरण है.
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

हर वृक्ष का अपना एकांत होता है. एक एकांत जिसके निर्माण करने की कला और रक्षा करने का सामर्थ्य हर वृक्ष की  जैविक संरचना में पहले से होता है. विशाल वन में भी - जिसमे हज़ारो की संख्या में वृक्ष होते है - हर वृक्ष अपना एकांत खोज लेता ...या शायाद निर्मित कर लेता है. हर पंछी जो उसकी डाल पर बैठता है...हर मुसाफिर जो उसकी छाह में सुस्ताता है...उस एकांत को महसूस करता है. हर हवा का झोंका जो वृक्ष को छूता है और हर फुहार जो उसको सराबोर कर देती है ... उस एकांत को जानते है..उसका सम्मान करते है.


वृक्ष का एकांत उसकी सबसे अनमोल निधि है.

जब तक वृक्ष है एकांत की संभावना जीवित है.

शहरों का फैलना और वृक्षों का कटना जारी है.

वृक्ष एकांत का पर्याय है... शहर अकेलेपन की सर्वोच्च संभावना.
(अकेलापन और एकांत पर्यायवाची नहीं होते)
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
 मै कई बार खड़े होकर दुनिया के इक बड़े से नक़्शे के बायीं ओर टंगे हुए छोटे से शीशे में एक बड़े हो रहे वृक्ष को निहारता हूँ. उसके मृत हो रहे हिस्से को देखता हूँ..धड़क रहे हिस्से की कोशिश को सुनता हूँ. जीवन की संभावनाओ को देख पुलकित भी होता हूँ.
लेकिन कुछ आवाज़े आ रही है.. फ़ोन बज रहा है.. मेल, ट्विटर, और फेसबुक नोटिफिकेशंस है. प्रतियोगी परिक्षाए है. बहुत साड़ी अपेक्षाए है.. आशाये है. कुछ तुम हो. कुछ मै हूँ. इक बड़ा शून्य है. कुछ यादो का कोलाज है, कुछ सपनो की टीस है...कुछ इच्छाओ की धुंध.

नज़दीक से जाना. शहर फ़ैल रहा है. सच में.

'नामहीन समुन्द्र के ना जाने/किस तट पर /तुम कहाँ हों ?/मै यातायात से भरे पथ पर/ 
अकेला बैठा हूँ यहाँ'











शनिवार, 23 मार्च 2013

डायरी... आखिरी पन्ना.

मिट्टी,
और
पानी, और
थोडा सा लाल रंग
का घोल बना कर
डाल गया था कोई आसमान पर.


वो
अपने कदमो के निशान
छोड़ गया था
उस सड़क पर
जो
इक ऊँची-नीची रेखा की तरह
क्षितिज को क्षितिज
से जोड़ती प्रतीत होती थी


इस पर चलने वाले
वो दोनों
शाश्वत प्रेमी थे.
क्षितिज से निकले थे
अनंत की यात्रा पे .


उस यात्रा में कई पड़ाव रहे -
विश्राम के लिए.
प्रेम के लिये.
गंगा,
अमृत,
और
विष भी बहा.
वो गंगारोहण और अमृतमंथन
के संगम का प्रतीक थे.


यात्रा अधूरी रही -
हर यात्रा की तरह.
वो यात्री
प्रेमी रहेंगे
सहयात्री नहीं.

यात्रा का एक मूल्य होता है
जो यात्री बिछुड़ कर चुकाते है.


....'अब मै आकाश को पुकारना चाहता हूँ'

शनिवार, 16 मार्च 2013

कुछ .. डायरी से ..


नदियाँ  समंदर की तिश्नगी को तृप्त करने की कोशिश करती हैं या धरती के उस हिस्से की प्यास को जिसे समंदर भी नहीं बुझा पाया ?
कोई नहीं जानता.
नदी प्रश्न और उत्तर की ज़बान नही बोलती. वो केवल आमंत्रण की भाषा जानती है.
पानी का आमंत्रण अमर होता है. आमंत्रित के स्वीकार/अस्वीकार से स्वतंत्र. स्वायत्त, शाश्वत और अमर.
प्रेम पानी सा होता है. समुन्द्र के पानी सा. पानी जिसमे उतर आता है नीला आसमान. और जिसमे समाता सा लगता है क्षितिज.
वैसे हमारा क्षितिज किसी और का आसमान होता है.
क्षितिज सौंदर्य की सबसे मुखर उपस्तिथियो और सटीक अभिव्यक्तियों  में से एक है (- कविता, चाँद,  मुस्कान और मटर के दाने के जैसे ).
सौंदर्य अनैतिक होने के लिए अभिशप्त है.
नैतिक समाज में सौंदर्य अप्राप्त्य रहेगा.
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
मैंने कभी कुछ नहीं रचा. या जो रचा वो इतना मूल्यहीन है की उसे डिसओन करना चाहता हूँ. हाँ - थोडा कुछ है जो समेटा है या समेटने की कोशिश की है. वही मूल्यवान है. यह कुछ ख़ुशी भी देता है और इक टीस भी - टीस - कि कितना कुछ था जो समेट न सका... सहेज ना पाया - खो दिया. शायद हमेशा के लिए.

इस टीस और इतिहास से मेरे प्रेम में कुछ गहरा सम्बन्ध है.

बुधवार, 23 जनवरी 2013

वो. जीवन.

                १ 
दिन भर द्वार खटकाने के बाद
चली गयी थी धूप
छोड़ कर के कुछ रंग
थोड़ी सी गर्माहट
और बहुत सारा भारीपन

आँखों को चुभा घना  अन्धेरा
जो हर बीतते पल के साथ हो रहा था और सघन,
और आरामदेह,

और खतरनाक

उसने डिब्बे में बंद की कुछ आवाज़े
एक काग़ज़ में लपेटी थोड़ी सी खुशबु
जेब में डाल ली एक धुन
चेहरे पे मली थोड़ी सी चांदनी

और निकल पड़ा वो घर से,
रास्ते चलते रहे
पैरो के नीचे से 
और वो गुज़रता गया 
जैसे गुज़र जाती है सदिया 
होते हुए मिथकों से 
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
                २ 
उसके निकलने के बाद
कमरे में गयी थी वो
बटोरने कुछ यादे
समेटने कुछ टुकड़े
(जिन्हें इतिहास अपने साथ ले जाना भूल जाता है अक्सर
एक गैरजिम्मेदाराना जल्दीबाजी में) 

कमरा-जिसमे छूट गयी थी- थोड़ी सी खुशबु, एक मुस्कान 
और थोड़ा सा अकेलापन
फर्श पर बिखरी थी
थोड़ी सी चांदनी
और बहुत सारी धूल
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
                ३ 
उस घर ने देखा था पथिक को
समझा था उसकी यात्रा को 
और सहा था लंबा इंतज़ार भी 

घर बेबस था,
असफल था, 
सुरक्षित था

घर तटस्थ था. 


क्योकि कुछ जगहों पर रह जाता है हमारा कुछ हिस्सा ..
समय, इतिहास और कारणों से परे.. कुछ निजी.

गुरुवार, 31 मई 2012

प्रेम , प्रश्न और प्रति-प्रश्न ???

प्रेम में होना
क्या होता है ?
या
क्या नहीं होता है^ ?

क्या  मिलन की अकुलाहट का
नाम
है प्रेम ??
(तो मिलन के बाद प्रेम समाप्त हों जाना चाहिए)

या सहारे का ही पर्यायवाच्ची है
(तब  तो मिलता होगा
 भरपूर
वो हर एक संस्था में
परिवार से अनाथालय तक)

या फिर एक खोज है
सतत ,निरंतर
पहचानने  की ,
समझने की , जानने की.
(फिर तो वो विज्ञानी भी होगा प्रेमी
जिसने खोजा था अणु सिद्धांत
करता गया उसे परिष्कृत
और बनाया
अणु बम)

या  फिर है प्रेम
होना
बस होना
हर प्रश्न और उत्तर के परे
शब्दों  और संज्ञाओ की सीमा से बाहर
निजी अनुभव
उतना ही निजी
जितना रहा हों
बुद्धत्व
या रही हों
सुजाता* की खीर
या होती हों
प्रसव  की पीड़ा 



Because, love is all about a mutually satisfying weirdness.

^ क्या नही है? - इस विषय पर शोध और अनुभव का समागम होना अभी (सोभाग्यवश या दुर्भाग्यवश) शेष है.
*Sujata, a maiden who, in Gautama Buddha's life, offered the Buddha a bowl of milk rice before he gave up the path of asceticism following six years of extreme austerities.