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मंगलवार, 5 मार्च 2019

दीवारें - 2

© एडवर्ड मंच, विकिमीडिया कॉमन्स 












मेरी स्मृति के पूरब में
एक प्रेम की दीवार है

उसपर लिखी है आधी कवितायें
और अधूरी कहानियाँ

हर कविता के दक्षिण में होता है
स्मृतियों का मरघट

अधूरी कहानियों के पात्र
प्रेत बनकर
अधूरी कविता के मरघट में घूमते हैं.

मैं प्रेम करता हूँ कि कहानी पूरी हो सके
ताकि वो प्रेत मुक्त हो जाएं.
प्रेम हर बार दगा कर जाता है
कहानी की बजाए कविता बन जाता है.

मुझे करने है अभी कई यत्न
जीने है अभी कई जीवन
सुननी और सुनानी है अभी कई कहानियाँ
देखने है अभी बहुत सारे स्वप्न

बस
मेरी उपस्थिति का सिरहाना हमेशा पूरब में रहे
कि ध्यान रखना कवि -
स्वप्न से भी प्रभावित होती है स्मृति
निद्रा स्वप्न-भंजक भी होती है.
और
दक्षिण में पैर करके नही सोते - ये मृत्यु की दिशा है.

                                             

शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

निष्कासन. विस्थापन.








अयोध्या से निष्कासित हुए थे राम
और मुहम्मद मक्का से
विस्थापित हैं कश्मीरी पंडित कश्मीर से
और लामा तिब्बत से
मेरी कविता से निष्कासित है प्रेम
मेरी कविता से निष्कासित है एक स्त्री

शहर घुस आया हैं मेरी कविता मे
जिसमे विस्थापित हूँ मैं

एक दिन झुक जाता हैं मक्का
मुहम्मद के सामने
और शुरू होती हैं इक धर्म की गौरव गाथा
एक दिन सजती हैं अयोध्या
चौदह सालो के विरह के बाद
आज तक जलते हैं उसके दीप

हर निष्कासन का एक सुखद अंत होता हैं.

लेकिन
यहाँ
जम सा गया हैं समय किसी कोने मे
स्मृति की शीत-दिशा में बहते-बहते.

सपनो में उन्हें
अब भी दिख जाते हैं
चिनार के पेड़.
सूखती आँखों में कभी-कभी उतर आता हैं
चिनाब का पानी

"बुद्धं शरणम् गच्छामि"
"संघम शरणम् गच्छामि"
"धम्मम् शरणम् गच्छामि"
के उद्घोष के बीच
अचानक आने लगता हैं एक अशांत मंत्र
"तिब्बत
 तिब्बत
 तिब्बत"

निष्कासन से नहीं
भय मुझे विस्थापन से हैं


जिसमें होता है
शून्य को ताकता
एक अंतहीन सा इंतज़ार

कभी ना ख़त्म होने वाला इंतज़ार |

शुक्रवार, 28 जून 2013

चलो किसी रोज़



चलो किसी रोज़
उन लफ्ज़ो के मानी खोजे
जो चुप्पी के अंधेरो मे
-अनजाने के डर से-
सन्नाटो की दीवारों से यू चिपके कुछ
कि ज़हन में बुलाने पर वापस
अब वो लफ्ज़ नहीं
घिसटते-चलते
कुछ दीवारे आती हैं

............................................................................

चलो किसी रोज़
इतनी कही-अनकही बातो
और पर्दा-बेपर्दा जज्बातों
के बीच पल रहे
अपने अपने डर से पूछे
उसके होने के मानी

कि
आज और कल के उलझाव में
ऐसा क्या हैं
जो रिश्तो की गांठो को कसने वाले हाथ
उधेड़ने लगते हैं यादों से बुने स्वेटर

.............................................................................

चलो किसी रोज़
रो-हँस कर
बहा दे इतना समंदर
कि पूरी ज़िन्दगी में
कभी नमक कम न हो.



मंगलवार, 28 मई 2013

खण्डहर- भाग २




हर गुज़रती रात के साथ
और स्याह होती
इकट्ठी नींदों की रोशनाई में
अतीत की कलम डुबोकर
ज़िन्दगी की स्लेट पर
उसने
लिखनी चाही इक कविता.

लेकिन स्याही में घुली
टीसों की कसक
कलम में अटकी एक पुकार
और
स्लेट के सतही मौन
के द्वंद से
जो उभरा अन्ततः
वो था एक दु :स्वप्न सरीखा.

स्वप्न देखने की आदि 
उन आँखों का धैर्य 
बह निकला पूरे वेग से 

इक बूँद समंदर की सुनामी
बहा ले गयी बहुत कुछ
अपने प्रवाह में
और
जो बचा
वो था
वर्तमान का
एक यतीम खण्डहर.

इक भग्नावशेष -
-अनाथ-
जिसका कोई इतिहास न था
और
इतना स्याह
जिस पर
किसी भविष्य, ईश्वर, प्रेम
या
कविता
के हस्ताक्षर की गुंजाईश न थी.

'मै जिधर खड़ा हु, उधर रात का मुहाना है.'