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शनिवार, 25 मई 2013

खण्डहर- भाग १

इतिहास ना तो विजेताओं के झूठ का पुलिंदा है ना पराजितो के भ्रमो का आख्यान. इतिहास उन जीते चले जा रहे लोगो का संस्मरण है, जिनमे से अधिकतर न तो विजेता है न ही पराजित |
                     
                                                             __________जूलियन बार्नेस, द सेंस ऑफ़ एन एंडिंग

                                                                                             @हौज़ ख़ास, नईं दिल्ली 

खण्डहर, स्मारक या भग्नावशेष गहरे - ह्रदय में कहीं - अचेतन या अर्धचेतन के स्तर पर, हमारे इक हिस्से का साकार रूप होते हैं. तभी तो उनसे एक नैसर्गिक जुड़ाव सा प्रतीत होता है - कुछ जान-पहचान जैसी, कुछ अपनेपन जैसा.

गहरे में- एक कोने में - हम सब एक खण्डहर (या ज्यादा) अपने साथ ढोते है- अपने इतिहास, अतीत, अपनी गरिमा, अपनी टीस, अपनी यादोँ, अपने दुख, अपने पछतावो, अपने एकांत से बना.

खण्डहर मृत होते हैं. पेड़ो के तने जैसे.

 ( वर्तमान की संरचनाओ पर जब भविष्य की रोशनी पड़ती है तो भूत में छाया की प्रतीति उभरती हैं. छाया की तरह खण्डहर के निर्माण के लिए भी अँधेरे और रोशनी के एक ख़ास तरह के अनुपात और समागम की आवश्यकता होती है. आत्मा के अँधेरे से स्याह कोई अन्धेरा संभव नही. भविष्य और आशाओं की रोशनी की चमक का जोड़ सृष्टि में मिलना दुर्लभ है. इस असंभव और दुर्लभ के बीच खण्डहर अपनी जगह खोज लेते है, सहेज लेते हैं).

खण्डहर नितांत निजी होते हैं. निजता से बाहर वो केवल मन बहलाव का, पर्यटन का, कौतुक का, बतकही का, स्थल बन सकते है. बस.
हर भग्नावशेष एक समय सभ्यता की, घर की, संभावना का साकार था. हर खण्डहर वर्तमान में जीवन पर मृत्यु के हस्ताक्षर का प्रतिनिधि हैं.

खण्डहर/भग्नावशेष शहर के बीचोबीच होकर भी शहर का, वर्तमान का, जीवन का, आपाधापी का, हिस्सा नहीं होता- हो ही नहीं पाता, हो ही नहीं सकता. अपनी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में भी खण्डहर की दीवारे इतनी सशक्त होती हैं कि शहर के प्रवेश को रोक सके.
हाँ सच में. तुमने सुना तो था शहर को बाहर छूटते.

जीवन में मृत्यु की गहन इच्छा निहित हैं. इतिहास उसी नश्वरता का बयान है और मृत्यु की अमरता का आख्यान भी. संतुलन इतिहास के सारतत्वो में से एक हैं.

इतिहास -निरंतरता और स्थायित्व के दो ध्रुवो, चेतना और जड़ता के  के बीच, सधा हुआ मध्य बिंदु है. मानो त्रिकोण के तीसरे कोण वाला मध्य, बुद्ध के मध्यम मार्ग वाला मध्य. भूत की जड़ता और भविष्य की संभावना के बीच की निरंतरता.

खण्डहर इतिहास के इसी संतुलन में कही अपनी उपयोगिता - अपना स्थान - अपना होना खोज लेते हैं. इतिहास खंडहरों को सहेजने - उनकी कहानी फिर से कहने, उनका दुःख समझने, उनकी टीस और दर्द सुनने की कला का उपक्रम है. इतिहास का भग्नावशेषो में जाने का उपक्रम गहन अर्थो में मानवीय है. और कैथार्टिक भी.

मुझे इतिहास से और उसकी इसी मानवीयता से प्रेम है.



खण्डहर इतिहास की पूँजी हैं. हम सबके खण्डहर.


शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

पीपल का पेड़ और इक खाली बेंच..


एक पुराने से पीपल के पेड़ के नीचे बिछी हुयी बेंच की ओर जाता हूँ बैठने और पाता हूँ कि पेड़ के कुछ टूटे पत्ते वहाँ आकर पहले से ही बैठे हुए थे. वैसे भी इस तरह की बेंचो पर बैठना टूटे पत्तो को कुछ ज्यादा ही पसंद हैं. शायद.

अपने बैठने के लिए मै पत्तो को सादर करता हु किनारे और देखता हूँ कि उन पीले पत्तो की भीड़ में कुछ हरे पत्ते भी हैं. वैसे पेड़ से टूट चुके हरे पत्ते और आस - पास बिखरे पीले पत्तो में कोई फर्क होता हैं क्या?

होना तो चाहिए.
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मै जब अकेले किसी बेंच पर बैठने जाता हूँ मुझे याद आ जाता है बचपन - अपना स्कूल, पापा का आफिस, उसमे बहुत सारे मोर. और बाबा.
गाँव से सैकड़ो मील दूर उस छोटे से शहर में बाबा जब भी कुछ महीनो के लिए आते तो हर शाम स्टेशन घूमने जाने का सिलसिला शुरू हो जाता. जाते हुए कुल्फी खाना और आते हुए कोक की जिद करना उन घंटो की दिनचर्या थी. स्टेशन घूमना क्या होता था - बस जाकर एक बेंच पर बैठ जाते थे. वो खैनी बनाते और मै दूर हट जाता क्योकि नहीं तो उसकी ठसक नाक में लगती और फिर मै छींकता रहता.
(कभी कभी सिगरेट के किसी कश या धुएं से वो ठसक अचानक से उठती है आज भी).
एक बार बेंच पर बैठे तो समय मानो ठहर जाता था. छोटे से स्टेशन से गुज़रती कुछ ट्रेन, मालगाड़ीयाँ, और इक्का दुक्का मुसाफिर. उस समय बेंच पर गिरने वाले पीले पत्ते मुझे याद नहीं. मुझे याद है बेंच पर बैठे बाबा.
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मेरे लिए स्टेशन संसार से उतने ही बाहर है जितना विश्वामित्र के लिए काशी थी.
(सारी दुनिया दान देने के बाद भी विश्वामित्र का बचा हुआ क़र्ज़ उतारने के लिए हरिश्चंद्र को काशी के एक मरघट में काम करना पड़ा. काशी में - क्योकि बाकी की दुनिया तो दान कर चुके थे).
अपनी दुनिया से मुझे जब भी बाहर निकलने का मन होता है, मै स्टेशन जाता हूँ. किसी एक शहर में होते हुए भी स्टेशन किसी एक शहर का नही होता.
स्टेशन तो शहर से बाहर जाने का द्वार होता है. (वैसे बाहर जाने का द्वार ही अन्दर आने का रास्ता भी सुझाता है!)
और स्टेशन से आने - जाने वालो की भीड़ के बीच कही न कही एक खाली बेंच इंतज़ार कर रही होती है.

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वैसे जिस पीपल के नीचे बुद्ध बैठते थे - वहां भी ज़रूर कोई बेंच रही होगी.
बुद्ध, बेंच और पीपल से मेरा प्रेम पुराना है.
जीवन प्रेम की खोज है. प्यास है. और एक सफल जीवन - प्रेम की श्रंखला.
हर प्रेम पिछले प्रेम की कीमत पर नही होता बल्कि उसे संजो के होता है.

'ज़िन्दगी मुझ को तेरा पता चाहिये'









गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

पेड़. शहर. डायरी....


एक वृक्ष जैसे जैसे बड़ा होता जाता है - जैसे जैसे वह फल देने लायक होने लगता है - जैसे जैसे वह मज़बूत होने लगता है - उसी समय उसका एक हिस्सा मृत हो रहा होता है. उस मृत हिस्से की बनावट, मजबूती, आकार ही बाज़ार में उस वृक्ष की कीमत तय करती है.  वह मृत, कठोर, जीवनहीन हिस्सा उसको फलो का बोझ और तूफानों के थपेड़े सहने की ताकत देता है . वही मृत हिस्सा वृहत्तर अर्थो में जीवन का आधार बन जाता है.

इस प्रकार मृत्यु अनिवार्यतः जीवन का विरोधी विलोम नहीं होती. जीवन की संभावनाए कई बार मृत्यु की गोद में ही जन्म लेती और फलती-फूलती है.

वैसे मृत्यु व्यवहारिकता का इक पर्याय है और खालिस जीवन निरा यूटोपिया.

विशाल वृक्ष जीवन और मृत्यु के सहस्तित्व का...तालमेल का.. अप्रतिम और सुलभ उदाहरण है.
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हर वृक्ष का अपना एकांत होता है. एक एकांत जिसके निर्माण करने की कला और रक्षा करने का सामर्थ्य हर वृक्ष की  जैविक संरचना में पहले से होता है. विशाल वन में भी - जिसमे हज़ारो की संख्या में वृक्ष होते है - हर वृक्ष अपना एकांत खोज लेता ...या शायाद निर्मित कर लेता है. हर पंछी जो उसकी डाल पर बैठता है...हर मुसाफिर जो उसकी छाह में सुस्ताता है...उस एकांत को महसूस करता है. हर हवा का झोंका जो वृक्ष को छूता है और हर फुहार जो उसको सराबोर कर देती है ... उस एकांत को जानते है..उसका सम्मान करते है.


वृक्ष का एकांत उसकी सबसे अनमोल निधि है.

जब तक वृक्ष है एकांत की संभावना जीवित है.

शहरों का फैलना और वृक्षों का कटना जारी है.

वृक्ष एकांत का पर्याय है... शहर अकेलेपन की सर्वोच्च संभावना.
(अकेलापन और एकांत पर्यायवाची नहीं होते)
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 मै कई बार खड़े होकर दुनिया के इक बड़े से नक़्शे के बायीं ओर टंगे हुए छोटे से शीशे में एक बड़े हो रहे वृक्ष को निहारता हूँ. उसके मृत हो रहे हिस्से को देखता हूँ..धड़क रहे हिस्से की कोशिश को सुनता हूँ. जीवन की संभावनाओ को देख पुलकित भी होता हूँ.
लेकिन कुछ आवाज़े आ रही है.. फ़ोन बज रहा है.. मेल, ट्विटर, और फेसबुक नोटिफिकेशंस है. प्रतियोगी परिक्षाए है. बहुत साड़ी अपेक्षाए है.. आशाये है. कुछ तुम हो. कुछ मै हूँ. इक बड़ा शून्य है. कुछ यादो का कोलाज है, कुछ सपनो की टीस है...कुछ इच्छाओ की धुंध.

नज़दीक से जाना. शहर फ़ैल रहा है. सच में.

'नामहीन समुन्द्र के ना जाने/किस तट पर /तुम कहाँ हों ?/मै यातायात से भरे पथ पर/ 
अकेला बैठा हूँ यहाँ'