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मंगलवार, 5 मार्च 2019

दीवारें - 2

© एडवर्ड मंच, विकिमीडिया कॉमन्स 












मेरी स्मृति के पूरब में
एक प्रेम की दीवार है

उसपर लिखी है आधी कवितायें
और अधूरी कहानियाँ

हर कविता के दक्षिण में होता है
स्मृतियों का मरघट

अधूरी कहानियों के पात्र
प्रेत बनकर
अधूरी कविता के मरघट में घूमते हैं.

मैं प्रेम करता हूँ कि कहानी पूरी हो सके
ताकि वो प्रेत मुक्त हो जाएं.
प्रेम हर बार दगा कर जाता है
कहानी की बजाए कविता बन जाता है.

मुझे करने है अभी कई यत्न
जीने है अभी कई जीवन
सुननी और सुनानी है अभी कई कहानियाँ
देखने है अभी बहुत सारे स्वप्न

बस
मेरी उपस्थिति का सिरहाना हमेशा पूरब में रहे
कि ध्यान रखना कवि -
स्वप्न से भी प्रभावित होती है स्मृति
निद्रा स्वप्न-भंजक भी होती है.
और
दक्षिण में पैर करके नही सोते - ये मृत्यु की दिशा है.

                                             

रविवार, 30 नवंबर 2014

राम नाम सत्य है!

एक कविता के बीचो-बीच
गुज़र जाती है एक अर्थी 
जीवन के बीचो-बीच 
ह्रदय को चीर कर जाती मृत्यु 

शोर के बीच 
अजाना-अनजाना रह जाता 
एक प्रश्न 

कि क्या सत्य है ? 
कोई भी नाम ?
कोई नाम.
राम.

गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

अनिद्रा उवाच

जानते हो अगर दिन अधूरा रह जाए तो नींद नहीं आती. या आती भी है तो इतनी सतही कि उठकर ऐसा लगे मानो एक छोटे अंतराल का बुरा सा स्वप्न देखा हो----
( क्या दिन अधूरा रह जाने पर ही ऐसा होता है ?/ और ये भी तो बताओ  की दिन पूरा हो जाने का पैमाना क्या होता है? )
 ----- क्योकि दिन की ताकते-जो सदा से जीवन की ताकतों के साथ रही हैं- रात के अँधेरे का अतिक्रमण कर जाती है..
.. रात की शान्ति, उसके भोलेपन और सबको अपना लेने की कोशिश या आदत ने उसे कई तत्वों के संघर्ष का मैदान बना दिया है.
जहा चाँद, तारे, और नक्षत्र दिन के हस्तक्षेप का प्रतिनिधित्व करते है और सूरज की उजली छवि के बल पर चमकते रहते है, वही शहर का अवसाद, चुप्पी और सन्नाटा भी रात की नैसर्गिक शान्ति और एकांत की आड़ में  वातावरण पर काबिज हो जाते है.

शहरों में नींद और रात को खोजना मुश्किल और उनका मेल कराना और भी दुष्कर होता जा रहा है.

सोने की सजग कोशिशे बदस्तूर जारी है.

शहर फ़ैल रहा है. सजग रहना.
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आज रात नींद नहीं आएगी वो जानता था. गहरी नींद सोये हुए ज़माना सा बीता लगता है. एक शोर है जो सोने नहीं देता या शायद स्वयं के निर्मित एकाकीपन से उपजा इतना सन्नाटा और सुनसान आसपास पसर गया है कि उसे सोने की जगह नहीं मिलती.

(किसी रोज़, आकर सब जगह पर लगा दो. सोने की थोड़ी सी जगह बना दो.)

"जगह खाली है, एक ईश्वर चाहिए !"







गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

पेड़. शहर. डायरी....


एक वृक्ष जैसे जैसे बड़ा होता जाता है - जैसे जैसे वह फल देने लायक होने लगता है - जैसे जैसे वह मज़बूत होने लगता है - उसी समय उसका एक हिस्सा मृत हो रहा होता है. उस मृत हिस्से की बनावट, मजबूती, आकार ही बाज़ार में उस वृक्ष की कीमत तय करती है.  वह मृत, कठोर, जीवनहीन हिस्सा उसको फलो का बोझ और तूफानों के थपेड़े सहने की ताकत देता है . वही मृत हिस्सा वृहत्तर अर्थो में जीवन का आधार बन जाता है.

इस प्रकार मृत्यु अनिवार्यतः जीवन का विरोधी विलोम नहीं होती. जीवन की संभावनाए कई बार मृत्यु की गोद में ही जन्म लेती और फलती-फूलती है.

वैसे मृत्यु व्यवहारिकता का इक पर्याय है और खालिस जीवन निरा यूटोपिया.

विशाल वृक्ष जीवन और मृत्यु के सहस्तित्व का...तालमेल का.. अप्रतिम और सुलभ उदाहरण है.
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हर वृक्ष का अपना एकांत होता है. एक एकांत जिसके निर्माण करने की कला और रक्षा करने का सामर्थ्य हर वृक्ष की  जैविक संरचना में पहले से होता है. विशाल वन में भी - जिसमे हज़ारो की संख्या में वृक्ष होते है - हर वृक्ष अपना एकांत खोज लेता ...या शायाद निर्मित कर लेता है. हर पंछी जो उसकी डाल पर बैठता है...हर मुसाफिर जो उसकी छाह में सुस्ताता है...उस एकांत को महसूस करता है. हर हवा का झोंका जो वृक्ष को छूता है और हर फुहार जो उसको सराबोर कर देती है ... उस एकांत को जानते है..उसका सम्मान करते है.


वृक्ष का एकांत उसकी सबसे अनमोल निधि है.

जब तक वृक्ष है एकांत की संभावना जीवित है.

शहरों का फैलना और वृक्षों का कटना जारी है.

वृक्ष एकांत का पर्याय है... शहर अकेलेपन की सर्वोच्च संभावना.
(अकेलापन और एकांत पर्यायवाची नहीं होते)
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 मै कई बार खड़े होकर दुनिया के इक बड़े से नक़्शे के बायीं ओर टंगे हुए छोटे से शीशे में एक बड़े हो रहे वृक्ष को निहारता हूँ. उसके मृत हो रहे हिस्से को देखता हूँ..धड़क रहे हिस्से की कोशिश को सुनता हूँ. जीवन की संभावनाओ को देख पुलकित भी होता हूँ.
लेकिन कुछ आवाज़े आ रही है.. फ़ोन बज रहा है.. मेल, ट्विटर, और फेसबुक नोटिफिकेशंस है. प्रतियोगी परिक्षाए है. बहुत साड़ी अपेक्षाए है.. आशाये है. कुछ तुम हो. कुछ मै हूँ. इक बड़ा शून्य है. कुछ यादो का कोलाज है, कुछ सपनो की टीस है...कुछ इच्छाओ की धुंध.

नज़दीक से जाना. शहर फ़ैल रहा है. सच में.

'नामहीन समुन्द्र के ना जाने/किस तट पर /तुम कहाँ हों ?/मै यातायात से भरे पथ पर/ 
अकेला बैठा हूँ यहाँ'