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मंगलवार, 28 मई 2013

खण्डहर- भाग २




हर गुज़रती रात के साथ
और स्याह होती
इकट्ठी नींदों की रोशनाई में
अतीत की कलम डुबोकर
ज़िन्दगी की स्लेट पर
उसने
लिखनी चाही इक कविता.

लेकिन स्याही में घुली
टीसों की कसक
कलम में अटकी एक पुकार
और
स्लेट के सतही मौन
के द्वंद से
जो उभरा अन्ततः
वो था एक दु :स्वप्न सरीखा.

स्वप्न देखने की आदि 
उन आँखों का धैर्य 
बह निकला पूरे वेग से 

इक बूँद समंदर की सुनामी
बहा ले गयी बहुत कुछ
अपने प्रवाह में
और
जो बचा
वो था
वर्तमान का
एक यतीम खण्डहर.

इक भग्नावशेष -
-अनाथ-
जिसका कोई इतिहास न था
और
इतना स्याह
जिस पर
किसी भविष्य, ईश्वर, प्रेम
या
कविता
के हस्ताक्षर की गुंजाईश न थी.

'मै जिधर खड़ा हु, उधर रात का मुहाना है.'


सोमवार, 17 दिसंबर 2012

     उसके प्रश्न में प्रश्नवाचक चिन्ह नहीं थे
     न उसके रोने मे आवाज़
इसलिए (?)
उसका प्रश्न और रुदन असहनीय था |

                                                                 


उसकी अभिव्यक्ति मूक थी
और भाषा निःशब्द
इसलिए (?)
वह खुद के लिए भी एक अजनबी था

     उसके विचार प्रगतिशील थे
     और प्रगतिशीलता तटस्थ
इसलिए (?)
उसका जीवन एक सुन्दर विचार था !

     मानवता उनका धर्म था
     और सारे धर्म अमानवीय
इसीलिए (?)
उनका समाज नास्तिक था |

     वो इश्वर को खोजना चाहते थे
     उस चाह को कभी नहीं खोज पाए
इसलिए (?)
उनका समाज पराजित था |

     उन्हें बहादुर दिखने की चाह थी
     उन्होंने कभी लड़ाई नहीं लड़ी
इसलिए (?)
वो लज्जित थे |

उन्हें लज्जा से डर लगता था
और अपने चेहरे से भी
......
उन्होंने मुखौटे लगा लिए |