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मंगलवार, 28 मई 2013

खण्डहर- भाग २




हर गुज़रती रात के साथ
और स्याह होती
इकट्ठी नींदों की रोशनाई में
अतीत की कलम डुबोकर
ज़िन्दगी की स्लेट पर
उसने
लिखनी चाही इक कविता.

लेकिन स्याही में घुली
टीसों की कसक
कलम में अटकी एक पुकार
और
स्लेट के सतही मौन
के द्वंद से
जो उभरा अन्ततः
वो था एक दु :स्वप्न सरीखा.

स्वप्न देखने की आदि 
उन आँखों का धैर्य 
बह निकला पूरे वेग से 

इक बूँद समंदर की सुनामी
बहा ले गयी बहुत कुछ
अपने प्रवाह में
और
जो बचा
वो था
वर्तमान का
एक यतीम खण्डहर.

इक भग्नावशेष -
-अनाथ-
जिसका कोई इतिहास न था
और
इतना स्याह
जिस पर
किसी भविष्य, ईश्वर, प्रेम
या
कविता
के हस्ताक्षर की गुंजाईश न थी.

'मै जिधर खड़ा हु, उधर रात का मुहाना है.'


शनिवार, 16 मार्च 2013

कुछ .. डायरी से ..


नदियाँ  समंदर की तिश्नगी को तृप्त करने की कोशिश करती हैं या धरती के उस हिस्से की प्यास को जिसे समंदर भी नहीं बुझा पाया ?
कोई नहीं जानता.
नदी प्रश्न और उत्तर की ज़बान नही बोलती. वो केवल आमंत्रण की भाषा जानती है.
पानी का आमंत्रण अमर होता है. आमंत्रित के स्वीकार/अस्वीकार से स्वतंत्र. स्वायत्त, शाश्वत और अमर.
प्रेम पानी सा होता है. समुन्द्र के पानी सा. पानी जिसमे उतर आता है नीला आसमान. और जिसमे समाता सा लगता है क्षितिज.
वैसे हमारा क्षितिज किसी और का आसमान होता है.
क्षितिज सौंदर्य की सबसे मुखर उपस्तिथियो और सटीक अभिव्यक्तियों  में से एक है (- कविता, चाँद,  मुस्कान और मटर के दाने के जैसे ).
सौंदर्य अनैतिक होने के लिए अभिशप्त है.
नैतिक समाज में सौंदर्य अप्राप्त्य रहेगा.
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मैंने कभी कुछ नहीं रचा. या जो रचा वो इतना मूल्यहीन है की उसे डिसओन करना चाहता हूँ. हाँ - थोडा कुछ है जो समेटा है या समेटने की कोशिश की है. वही मूल्यवान है. यह कुछ ख़ुशी भी देता है और इक टीस भी - टीस - कि कितना कुछ था जो समेट न सका... सहेज ना पाया - खो दिया. शायद हमेशा के लिए.

इस टीस और इतिहास से मेरे प्रेम में कुछ गहरा सम्बन्ध है.

सोमवार, 17 दिसंबर 2012

     उसके प्रश्न में प्रश्नवाचक चिन्ह नहीं थे
     न उसके रोने मे आवाज़
इसलिए (?)
उसका प्रश्न और रुदन असहनीय था |

                                                                 


उसकी अभिव्यक्ति मूक थी
और भाषा निःशब्द
इसलिए (?)
वह खुद के लिए भी एक अजनबी था

     उसके विचार प्रगतिशील थे
     और प्रगतिशीलता तटस्थ
इसलिए (?)
उसका जीवन एक सुन्दर विचार था !

     मानवता उनका धर्म था
     और सारे धर्म अमानवीय
इसीलिए (?)
उनका समाज नास्तिक था |

     वो इश्वर को खोजना चाहते थे
     उस चाह को कभी नहीं खोज पाए
इसलिए (?)
उनका समाज पराजित था |

     उन्हें बहादुर दिखने की चाह थी
     उन्होंने कभी लड़ाई नहीं लड़ी
इसलिए (?)
वो लज्जित थे |

उन्हें लज्जा से डर लगता था
और अपने चेहरे से भी
......
उन्होंने मुखौटे लगा लिए |