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रविवार, 10 नवंबर 2019

मैं टुकड़े-टुकड़े समझ जोड़ रहा हूँ - 1











हिम्मत टुकड़े टुकड़े जोड़ कर बनती है
टूटतीं भी हिस्सो में है

मैं टूटता हूँ, भूलता हूँ
बनता हूँ, याद करता हूँ

एक पंक्ति लिखकर मै हिसाब दोहराना चाहता हूँ
एक पंक्ति लिखकर मै सब सुलझाना चाहता हूँ

एक लम्बे समय से अपनी हर कविता में
मै लिख रहा हूँ एक ही पंक्ति बार-बार

मेरा हर शब्द इतना छोटा है
कि काग़ज़ पर कविता नही
एक लकीर नज़र आती है

मैं कविता लिखता 
और लकीरो से ढकने लगता जीवन का यथार्थ 
कभी मिटाता कोई लकीर
तो जीवन से विदा ले लेती कोई पुरानी कविता

गले में अटकते
दुःस्वप्नों में भटकते
बेमतलब -
घिस चुके शब्द
एक-एक कर छोड़ रहा हूँ

मैं टुकड़े-टुकड़े समझ जोड़ रहा हूँ











बुधवार, 17 अप्रैल 2019

बेस्ट ऑफ थ्री



Street Still Life, Martin Vorel













जो याद है उसे भूलना मुश्किल है
जो भूल रहा है उसे बनाये रखना उससे भी कठिन
लिखे हुए को मिटाने और काटे हुए को पढ़ने में बहुत वक़्त ज़ाया होता है
ये सोचकर सारे कवि रोटी कमाने चले गए.

हमारे वक़्त में न रोटी की कमी है न शब्दो की
फिर भी भूख से मर जाते है लोग
और जीवन से गायब रहती कविता.

किसी रानी का स्वर कहीं पार्श्व से गूंजता
ये भूखे लोग रोटी की जगह शब्द क्यो नही खा लेते

कोई क्रांतिकारी भूख मिटा देने वाली
गिलोटिन देख कर मुस्कुरा रहा है.

अपनी दुनिया को मैं हर बार एक विस्मय के साथ देखता हूँ
इतिहास देखता है वापस मुझे
मेरी ही नज़रों से

प्रेम से बिंधे एक युगल की तरह
हम दोनों ही निराश भी होते है अक्सर एक दुसरे से

हम हताश होते है उस दोहराव से
जो पहली बार त्रासदी और फिर उसके बाद
हर बार एक स्वांग लगा.

प्रेम
इतिहास,
कविता,
बेस्ट ऑफ थ्री में बच जाएंगे में हम शायद,
इस बचकानी उम्मीद की आंखों में मोतियाबिंद है.

प्रेम, इतिहास, कविता से
अगर तापें जाएंगे केवल अलाव
तो उम्मीदे गर्म भर रहेंगी
राख हो जाने तक.

समझ के साथ जीने के लिए हमे लपट नही
थोड़ी सी रोशमी चाहिए, बस.


सोमवार, 18 मार्च 2019

मिरर इमेज

कमरे के एक हिस्से से झांकता दूसरा हिस्सा 













मेरे नए कमरे में दो शीशे हैं -
एक पहले से दीवार पे जड़ा था
दूसरा मेरे साथ आई अलमारी पर आया

दोनों में मेरा अक्स
मुझे अलग-अलग सा दिखता है.

ये रोशनी का फेर भी हो सकता है या मेरी उनसे दूरी का अंतर
या फिर क्या पता बदल जाते हों देखने के कोण

वैसे, मुझे ये लगता है ये दोनों शीशो की उम्र का अंतर है.

तुम नहीं समझोगे
कि कैसा लगता है मुझे ये जानकर
कि ज़रा सी जगह, कोण या उम्र बदलने पर
बदल सकता है मेरा 'मै' होना.

मेरा इंजिनियर दोस्त बस दो मिनट में समझाकर भौतिकी और प्रकाश के नियम
धो देता है सारी 'नाटकीयता'
नियमो के आलोक में  जीवन की व्याख्या
मिनट-दो मिनट ही तो लेती है.

बस, ये सब बताते हुए
उसकी आँखों में वो नमी नहीं दिखती
जो कम से कम मेरे एक अक्स में
अब भी बिलकुल साफ़ दिखाई पड़ती है.

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018

हिबाकु-जुमोकु


हिरोशिमा में छह अगस्त को आसमान से बरसी थी आग
लील गयी थी वो सबकुछ
झुलस गया था सारा जीवन
और भाप हो गए थे सपने भी

उसके धुंए के छटने से पहले ही  वहां वापस हरे हो गए थे हिबाकु-जुमोकु पेड़

जब था कल्पना के भी धुंआ हो जाने का डर
तब पृथ्वी के गर्भ से निकला ये सबसे मानवीय आश्वासन था

तबसे से अब तक
चुका नही है ये आश्वासन

फिलिस्तीन की दीवारों पर भी उग आते हैं
और कश्मीर के बीचोंबीच गुज़रती बाड़बंदी पर चढ़ने लगते हैं वो
बामियान में बारूद की गंध उसके पत्तो ने ही सोखी
और पोखरन के उसको देख कर ही असल मे मुस्कुराये थे बुद्ध

इतिहास के पन्नो से नज़र उठा कर
मैं देखता हूँ किसी स्त्री के कान पर लगे झुमके जब भी
मेरी आँखों के सामने आ जाते है
 जापान के वही हिबाकु-जुमोकु पेड़

जोहानेस वेर्मीर की मशहूर कृति 'Girl with a pearl earring'













सोमवार, 5 नवंबर 2018

यथार्थ और संभावना

मिखाल रपाक की कृति 













हम जो जी रहे है 
और जो जी सकते है 
उसमे क्या जिया हुआ ही यथार्थ है,
और बाकी सब संभावना?

मसलन मेरा घर से निकलना यथार्थ है 
लेकिन बीच रास्ते में होना संभावना
मेरा लिखा यथार्थ है 
तुम्हारा इसे पढ़ना - संभावना  

या धू-धू कर जो जलता है चिता पर 
वही होता है ठोस यथार्थ 
और बीच-बीच में फूटती चिंगारियां 
शोक मनाती संभावनाएं 

कभी-कभी संदिग्ध होता यथार्थ 
कभी कितनी विश्वसनीय लगती संभावनाएं 

संदेह-विश्वास, प्रेम-संत्रास के बीच 
ऊंट किस करवट बैठेगा - 
ये हमारी भाषा का मुहावरा है. 

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संभावना और यथार्थ मानो सिक्के के दो पहलू हैं 
और चित्त या पट का इंतज़ार
बुरे अफसानानिगारो का शगल

मुझे नही पता ये विज्ञान है या दर्शन 
या कि कपोल-कल्पित गल्प
लेकिन उम्मीदों का गुरुत्वाकर्षण बल न हो दुनिया मे अगर
तो रह सकता है अनंत काल तक हवा में 
एक घूमता हुआ सिक्का