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रविवार, 10 नवंबर 2019

मैं टुकड़े-टुकड़े समझ जोड़ रहा हूँ - 1











हिम्मत टुकड़े टुकड़े जोड़ कर बनती है
टूटतीं भी हिस्सो में है

मैं टूटता हूँ, भूलता हूँ
बनता हूँ, याद करता हूँ

एक पंक्ति लिखकर मै हिसाब दोहराना चाहता हूँ
एक पंक्ति लिखकर मै सब सुलझाना चाहता हूँ

एक लम्बे समय से अपनी हर कविता में
मै लिख रहा हूँ एक ही पंक्ति बार-बार

मेरा हर शब्द इतना छोटा है
कि काग़ज़ पर कविता नही
एक लकीर नज़र आती है

मैं कविता लिखता 
और लकीरो से ढकने लगता जीवन का यथार्थ 
कभी मिटाता कोई लकीर
तो जीवन से विदा ले लेती कोई पुरानी कविता

गले में अटकते
दुःस्वप्नों में भटकते
बेमतलब -
घिस चुके शब्द
एक-एक कर छोड़ रहा हूँ

मैं टुकड़े-टुकड़े समझ जोड़ रहा हूँ











सोमवार, 18 मार्च 2019

हाथ - 1

गुस्ताव क्लिम् की मशहूर पेंटिंग 












प्रेम को छिटक जाने देना
गैर-इरादतन हत्या करने जैसा है
जिसमे जुर्म वही रहता है
बस सज़ा कम मिलती है.

हर हथियार की धार को कभी गौर से देखना
वो इतनी पैनी होती है
कि नही होती उसपर किसी माफी
या पछतावे के एक क्षण जितनी
महीन-सी भी जगह

तमाम कातिल अपना जुर्म
पूरी तरह तभी समझ पाते है
जब एक रोज़
मूठ की जगह उनका सामना चाकू की धार से होता है.

हमारे हाथो की सबसे गहरी लकीरें
चाकू को उल्टा पकड़ने से बने निशान है.


मिरर इमेज

कमरे के एक हिस्से से झांकता दूसरा हिस्सा 













मेरे नए कमरे में दो शीशे हैं -
एक पहले से दीवार पे जड़ा था
दूसरा मेरे साथ आई अलमारी पर आया

दोनों में मेरा अक्स
मुझे अलग-अलग सा दिखता है.

ये रोशनी का फेर भी हो सकता है या मेरी उनसे दूरी का अंतर
या फिर क्या पता बदल जाते हों देखने के कोण

वैसे, मुझे ये लगता है ये दोनों शीशो की उम्र का अंतर है.

तुम नहीं समझोगे
कि कैसा लगता है मुझे ये जानकर
कि ज़रा सी जगह, कोण या उम्र बदलने पर
बदल सकता है मेरा 'मै' होना.

मेरा इंजिनियर दोस्त बस दो मिनट में समझाकर भौतिकी और प्रकाश के नियम
धो देता है सारी 'नाटकीयता'
नियमो के आलोक में  जीवन की व्याख्या
मिनट-दो मिनट ही तो लेती है.

बस, ये सब बताते हुए
उसकी आँखों में वो नमी नहीं दिखती
जो कम से कम मेरे एक अक्स में
अब भी बिलकुल साफ़ दिखाई पड़ती है.

मंगलवार, 5 मार्च 2019

दीवारें - 2

© एडवर्ड मंच, विकिमीडिया कॉमन्स 












मेरी स्मृति के पूरब में
एक प्रेम की दीवार है

उसपर लिखी है आधी कवितायें
और अधूरी कहानियाँ

हर कविता के दक्षिण में होता है
स्मृतियों का मरघट

अधूरी कहानियों के पात्र
प्रेत बनकर
अधूरी कविता के मरघट में घूमते हैं.

मैं प्रेम करता हूँ कि कहानी पूरी हो सके
ताकि वो प्रेत मुक्त हो जाएं.
प्रेम हर बार दगा कर जाता है
कहानी की बजाए कविता बन जाता है.

मुझे करने है अभी कई यत्न
जीने है अभी कई जीवन
सुननी और सुनानी है अभी कई कहानियाँ
देखने है अभी बहुत सारे स्वप्न

बस
मेरी उपस्थिति का सिरहाना हमेशा पूरब में रहे
कि ध्यान रखना कवि -
स्वप्न से भी प्रभावित होती है स्मृति
निद्रा स्वप्न-भंजक भी होती है.
और
दक्षिण में पैर करके नही सोते - ये मृत्यु की दिशा है.

                                             

दीवारें - 1

(c) ज़ेफ़ सफी, flickr












दीवारें कितनी मज़बूत और ताकतवर दिखती है,
दरकने से ऐन पहले तक.
दरकना कितना अदृश्य होता है,
अदृश्य कितना ताकतवर. 

अदृश्य में निवास करते सारे देवता
पुरखे
आत्मा
और प्रेत.
अदृश्य में निवास करता जीवन का ब्लैकहोल.

बस यही से शुरू होती सारी गड्डमड्ड

मैं कुछ बुरा भला कहता अपने पुरखों को
और बींध जाती अपनी ही आत्मा.
मैं सहेजना चाहता जीवन को स्मृति में 
और निगल जाता उसे एक ब्लैकहोल.
मैं दुख में याद करता देवताओं को
उससे और अधिक पोषित हो जाते मेरे प्रेत.
मैं दृश्य में जब भी रखने लगता अपने हथियार
अदृश्य में शुरू हो जाता एक अंतर्द्वंद.

इसमे द्वैत-अद्वैत की बहस नही
आदम को मिला श्राप है.

दृश्य और अदृश्य का द्वंद पूर्वर्निश्चित  है.
धर्म के छात्र हो
तो इसे नियति कह सकते हो.

इतिहास के छात्र हो तो
खोजो कि ये धर्म क्यो अफीम है?

नियाति से लड़ना साहस है,
श्राप से लड़ना तप.

इस सबके के बीच
जिस दीवार पर लिखी है जीवन के मूल्यों की बहस
मैं उसी दीवार की ओट में खड़ा हूँ
आधा आसरा लेकर
आधा सहारा देकर.

बुधवार, 23 दिसंबर 2015

विस्मृति एक आदिम जिद है.










सड़क शहरों को जोड़ती नही
शहर को शहर बनाती है.
वो निर्धारित करती है 
हमारे चलने का ढंग,
हमारी गति,
और हमारा गंतव्य भी.
गलियों में चलने वाला मनुष्य ज्यादा स्वायत्त होता है. 

पहाड़ो, नदियों और अब तो 
समंदर तक भी पहुँच गयी है सड़क.
मेरा गाँव भी 
बस शहर से दूर है
सड़क से नही
जिसको पोषित करती है अनगिन गलियाँ .
मै दस बरस बाद भी गलियों से होता हुआ पहुँच सकता हूँ अपने गाँव वाले घर.

मुझे नही याद रहते सड़को के नाम, 
घरो के पते,
और रास्ते भी. 
पिता इसे स्मृति-दोष कहते है 
और तुम मेरी लापरवाही.    
मुझे गहरे मे ये विस्मृति कोई आदिम जिद-सी लगती है.

हांलाकि मै गलत भी हो सकता हूँ.
असल में,
जिस तरह आप एक ही नदी में दो बार नही उतर सकते,
आप एक ही सड़क पर दो बार नही चल सकते.
और मुझे याद नही उस रोज़ सड़क पर चलते हुए
मैंने इस विषय में क्या सोचा था.  


सोमवार, 8 दिसंबर 2014

अपने समय के लिए/अपने लिए - 2










कोई अंतराल नही
कोई पर्दा नही गिरता
बदलते, बढ़ते
जाते है पात्र
वो मुझे शाबाशी देते है
मै उनके लिए तालियाँ बजाता हूँ
इस तरह हम एक दूसरे का उपहास करते है.


जिस समय में
कोई निर्दोष नही है
हमारे पहचान-पत्र राशन कार्ड बन गए है
और नाम इतिहास में बिसरा दी गयी तारीख
एक आम दुर्घटना की तरह हुआ ये जानना
कि मेरी असफलता ही मेरी इकलौती उपलब्धि है.
कि इसके वज़न की गहराई
मेरे ह्रदय के अँधेरे तक है.
कि इस असफलता के साँचे से होकर गुज़रता है
मेरा बोलना
सुनना
चुप रहना
और प्रेम करना भी.


मैंने जो किया
वो हमेशा अलग रहा उससे
जो करना चाहा था
ये एक हत्यारे की आखिरी दलील है
जिसे क़यामत के दिन
अनसुना छोड़ दिया जाएगा.

रविवार, 30 नवंबर 2014

राम नाम सत्य है!

एक कविता के बीचो-बीच
गुज़र जाती है एक अर्थी 
जीवन के बीचो-बीच 
ह्रदय को चीर कर जाती मृत्यु 

शोर के बीच 
अजाना-अनजाना रह जाता 
एक प्रश्न 

कि क्या सत्य है ? 
कोई भी नाम ?
कोई नाम.
राम.

शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2014

अहिल्या के प्रश्न








क्या मूल्य ?
क्या नैतिकता ?
क्या प्रेम ?
क्या न्याय ?
कौन हो दण्ड का भागी?
कहो महिर्षि गौतम
इन्द्र?
चन्द्र?
मै ?
या हर न्यायाधीश ?

हर पत्थर मुक्त हो जाता है
अपनी जड़ता से
लेकिन कितने युगों के बाद?
जाने किसके स्पर्श से?

जीवन के वर्तुल में
एक श्राप को काटता
एक दूसरा श्राप.
ये कैसा न्याय है ?

क्या तुम्हारा अभिमान नही समझता इतना भी
कि ठोकर से पत्थर वापस मनुष्य नही बनता
मनुष्यता पत्थर हो जाती है
और इतिहास कलंकित.

हे क्रोधोन्मत्त व्रतानुरागी
मै अहिल्या नही
इतिहास हूँ.
मेरे प्रश्नों को भस्म नही कर सकते तुम्हारे श्राप
ना वो अनैतिक हो जाते है तुम्हारे कहने पर.

अवतार मुक्त करेगा
मुझको
या तुमको?

तुम्हारा श्राप मुक्त नही न्यूटन के तीसरे नीयम से
जाओ
सिसीफस से पूछो
क्या एक दिन हर श्राप की मियाद पूरी हो जाती है ?

गुरुवार, 18 सितंबर 2014

स्मृति-पुराण







जीवन-मृत्यु
विष-अमृत
माया-मोक्ष
देह-आत्मा
प्रेम-स्मृतियाँ

निर्णय ने रोक दिया हैं कोई भी मंथन
देवता और असुर खामोश हैं
और लज्जित भी

समंदर के शोर की गूँज
आकाश के मौन से टकराकर
बदलती हैं हर रोज़ नमक में

थोड़ा सा नमक खानें में काम आता हैं
और बहुत सारा दफनाने में.


सोमवार, 14 अप्रैल 2014

सुविधा, सच, समझ - तीन छोटी कवितायें












मेरी स्मृति
गहरे में मेरा चयन हैं.

हर चयन
एक सुविधा हैं.

हर सुविधा
सुविधाजनक नही होती.

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

शोर और शब्द के मेल से बनी इस भाषा में
निःशब्द होना आया मेरे हिस्से

प्रश्न और उत्तर की शैली में बात करते करते
भूल गए हम
कि हर प्रश्न का दायरा
तय कर देता हैं उत्तर की सीमा

सीमा के भीतर रहने के लिए
एक सच टूटकर
कई टुकड़े झूठ बनता हैं.

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

मेरी खिड़की से दिखने वाले नक्षत्र
तुम्हारे तारो से अलग है
यह हमारे आकाश का नही
खिड़कियो का भेद हैं.

अभी हमारा ये समझना बाकी हैं.

सोमवार, 17 मार्च 2014

महानदी और प्रेम











लड़का करेगा लम्बी यात्राऐं
पार करता शहर,
नदियाँ, जंगल, पर्वत
मन के एक हिस्से से
ह्रदय के केंद्र की ओर.

लड़का लिखेगा छोटी कविताएँ
जिससे बाहर रहेंगे दुनिया भर के यथार्थ
और सहेजी जाएगी केवल
सत्य-असत्य, प्रेम-अप्रेम,
और 
स्वप्न की खोज.

एक महासमुन्द्र के किनारे
लड़का करेगा महानदी से प्रेम
स्मृति और स्वप्न के मुहाने पर
रचेगा नए यथार्थ

कुछ और खारा हो जाएगा समंदर
थोड़ी और मीठी हो जाएगी नदी.

गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

शहर - १










शहर को लड़ना पड़ता हैं
जंगल से
बसने से पहले  |

शहर बस जाता हैं
एक दिन |

आती हैं रात को अब भी
वहाँ आदिम आवाज़े
जंगल से...
भीतर से...
बाहर से...

जंगल कहीं नही जाता |

मंगलवार, 12 नवंबर 2013

इन्हीं सर्दियों में









इन सर्दियों मेरे पास जलाने के लिए
अलाव बहुत कम हैं
जमा हो गयी हैं ढेर सारी राख
इतनी सर्दियों से गुज़रते-निपटते


याद आते हैं मुझे सर्दियों में नंगे घूमते फ़कीर
लपेटे हुए भभूत
अपने ठिठुरते जिस्म पर
जो कांपना भूल चुका हैं


क्या हुआ ऐसा जो उस जिस्म ने चुना
राख का लबादा
बचने के लिए
ज़िन्दगी की सर्दियों से


इतिहास के विस्मृत अध्यायों से गुज़रता
उसके भग्नावेश सरीखे अस्तित्व पर
मै ढूँढता हूँ घर की दीवार फांदते हुए लगे किसी चोट के निशाँ को
-शायद सालो से जोट रहा हो मरहम की राह
माथे पर स्मृतियों की लकीरों को
-शायद खोज लू उसमे छूट चुका घर उसका
अपना


सब अदृश्य है
-छिपा हुआ
राख की इक झीनी सी, लेकिन ठोस परत के पीछे


कांप उठता हूँ ये जानकर
बिलकुल यूं ही
जैसे अभी
कांप रहा हूँ
देखते हुए
इस राख को


तभी इस बिलकुल वीरान सी रात
ठंडी होती जा रहीं आत्मा पर
महसूस होती हैं गर्माहट
स्याही मे घुले शब्दों की


मानो जाने-पहचाने हाथो ने
ओढ़ा दी हो इक दुशाला
और जला दिया हो सामने
यादो का अलाव


अचानक स्मृति में से
न जाने कहाँ चले जाता है
वो नंगा फ़कीर
अपने उस ठिठुरते जिस्म के साथ
जो कांपना भूल चुका हैं


क्या उसको भी मिल जाता हैं एक ठौर
कुछ उम्मीदों का
कुछ संभावनाओं का

इन्ही सर्दियों के बीच ?

शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

निष्कासन. विस्थापन.








अयोध्या से निष्कासित हुए थे राम
और मुहम्मद मक्का से
विस्थापित हैं कश्मीरी पंडित कश्मीर से
और लामा तिब्बत से
मेरी कविता से निष्कासित है प्रेम
मेरी कविता से निष्कासित है एक स्त्री

शहर घुस आया हैं मेरी कविता मे
जिसमे विस्थापित हूँ मैं

एक दिन झुक जाता हैं मक्का
मुहम्मद के सामने
और शुरू होती हैं इक धर्म की गौरव गाथा
एक दिन सजती हैं अयोध्या
चौदह सालो के विरह के बाद
आज तक जलते हैं उसके दीप

हर निष्कासन का एक सुखद अंत होता हैं.

लेकिन
यहाँ
जम सा गया हैं समय किसी कोने मे
स्मृति की शीत-दिशा में बहते-बहते.

सपनो में उन्हें
अब भी दिख जाते हैं
चिनार के पेड़.
सूखती आँखों में कभी-कभी उतर आता हैं
चिनाब का पानी

"बुद्धं शरणम् गच्छामि"
"संघम शरणम् गच्छामि"
"धम्मम् शरणम् गच्छामि"
के उद्घोष के बीच
अचानक आने लगता हैं एक अशांत मंत्र
"तिब्बत
 तिब्बत
 तिब्बत"

निष्कासन से नहीं
भय मुझे विस्थापन से हैं


जिसमें होता है
शून्य को ताकता
एक अंतहीन सा इंतज़ार

कभी ना ख़त्म होने वाला इंतज़ार |

सोमवार, 28 अक्टूबर 2013

रोना. बुद्ध होना.

जानते हो 
उस दिन 
इतने प्रयास, निराशा, कातरता, 
व्रत, खोज, जागरण,
अनिद्रा, 
और भूख 
से थका वो भिक्षु 
सुजाता की खीर खाने के तुरंत बाद 
रोया था 
आखिरी बार 

बुद्ध होने से पहले |

बुद्ध का रोना
बाहर छोड़ दिया गया
सूत्रों, पित्तको,
और जातक कथाओ से भी
इस तरह एक भिक्षु को बनाया गया भगवान्

बुद्ध होने के बाद |

जीवन से बाहर छूट गया सदा के लिए
भिक्षु का रोना.

बुद्ध का होना.


                                                                                   

शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

अँधेरे में कविता - १








उसने पूछा 

अब कविता नही लिखते?
मैंने सोचा 
ये शहर बहुत छोटा हैं 
और दुनिया बहुत बड़ी. 

उसने पूछा 
यूं ही चुप रहोगे ?
मैंने कहा 
प्रेम बहुत निजी हैं 
बाकी सब सामाजिक.

उसने पुछा 
क्या दुनिया सचमुच गोल हैं?
मैंने देखा 
दिन जल्दी बीत गया 
शाम ढल आयी हैं.

उसने पूछा 
हुआ क्या हैं?
मुझे लगा 
यहाँ जो भी न्यायाधीश नहीं हैं 
वो कठघरे में खड़ा हैं.

उसने शायद कहा ...
प्रेम..... .............?
जाने से पहले आखिरी बार 
मैंने उसकी आँखों में देखा.

~~~~~~

"वजह की तलाश में
बेवजह भटकते-भटकते 
खो मत जाना 
खयालो के उस बियाबान में 
जहाँ होता हैं 
इतना नीरव अन्धकार 
कि नहीं सूझता 
हाथ को हाथ
बुद्धि को तर्क 
और ह्रदय को प्रेम"

~~~~~~

शाम ठहर गयी
सब एक-दम शांत था 


वो दोनों अब समंदर को देख रहे थे 
बूझने की कोशिश मे 
कि ये सैलाब के बाद का सन्नाटा हैं 
या तूफ़ान से पहले की खामोशी ....... 







*चित्र हलें कोत्तले और डेन वर्नर के 

शुक्रवार, 28 जून 2013

चलो किसी रोज़



चलो किसी रोज़
उन लफ्ज़ो के मानी खोजे
जो चुप्पी के अंधेरो मे
-अनजाने के डर से-
सन्नाटो की दीवारों से यू चिपके कुछ
कि ज़हन में बुलाने पर वापस
अब वो लफ्ज़ नहीं
घिसटते-चलते
कुछ दीवारे आती हैं

............................................................................

चलो किसी रोज़
इतनी कही-अनकही बातो
और पर्दा-बेपर्दा जज्बातों
के बीच पल रहे
अपने अपने डर से पूछे
उसके होने के मानी

कि
आज और कल के उलझाव में
ऐसा क्या हैं
जो रिश्तो की गांठो को कसने वाले हाथ
उधेड़ने लगते हैं यादों से बुने स्वेटर

.............................................................................

चलो किसी रोज़
रो-हँस कर
बहा दे इतना समंदर
कि पूरी ज़िन्दगी में
कभी नमक कम न हो.



शनिवार, 23 मार्च 2013

डायरी... आखिरी पन्ना.

मिट्टी,
और
पानी, और
थोडा सा लाल रंग
का घोल बना कर
डाल गया था कोई आसमान पर.


वो
अपने कदमो के निशान
छोड़ गया था
उस सड़क पर
जो
इक ऊँची-नीची रेखा की तरह
क्षितिज को क्षितिज
से जोड़ती प्रतीत होती थी


इस पर चलने वाले
वो दोनों
शाश्वत प्रेमी थे.
क्षितिज से निकले थे
अनंत की यात्रा पे .


उस यात्रा में कई पड़ाव रहे -
विश्राम के लिए.
प्रेम के लिये.
गंगा,
अमृत,
और
विष भी बहा.
वो गंगारोहण और अमृतमंथन
के संगम का प्रतीक थे.


यात्रा अधूरी रही -
हर यात्रा की तरह.
वो यात्री
प्रेमी रहेंगे
सहयात्री नहीं.

यात्रा का एक मूल्य होता है
जो यात्री बिछुड़ कर चुकाते है.


....'अब मै आकाश को पुकारना चाहता हूँ'

बुधवार, 23 जनवरी 2013

वो. जीवन.

                १ 
दिन भर द्वार खटकाने के बाद
चली गयी थी धूप
छोड़ कर के कुछ रंग
थोड़ी सी गर्माहट
और बहुत सारा भारीपन

आँखों को चुभा घना  अन्धेरा
जो हर बीतते पल के साथ हो रहा था और सघन,
और आरामदेह,

और खतरनाक

उसने डिब्बे में बंद की कुछ आवाज़े
एक काग़ज़ में लपेटी थोड़ी सी खुशबु
जेब में डाल ली एक धुन
चेहरे पे मली थोड़ी सी चांदनी

और निकल पड़ा वो घर से,
रास्ते चलते रहे
पैरो के नीचे से 
और वो गुज़रता गया 
जैसे गुज़र जाती है सदिया 
होते हुए मिथकों से 
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
                २ 
उसके निकलने के बाद
कमरे में गयी थी वो
बटोरने कुछ यादे
समेटने कुछ टुकड़े
(जिन्हें इतिहास अपने साथ ले जाना भूल जाता है अक्सर
एक गैरजिम्मेदाराना जल्दीबाजी में) 

कमरा-जिसमे छूट गयी थी- थोड़ी सी खुशबु, एक मुस्कान 
और थोड़ा सा अकेलापन
फर्श पर बिखरी थी
थोड़ी सी चांदनी
और बहुत सारी धूल
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
                ३ 
उस घर ने देखा था पथिक को
समझा था उसकी यात्रा को 
और सहा था लंबा इंतज़ार भी 

घर बेबस था,
असफल था, 
सुरक्षित था

घर तटस्थ था. 


क्योकि कुछ जगहों पर रह जाता है हमारा कुछ हिस्सा ..
समय, इतिहास और कारणों से परे.. कुछ निजी.